राष्ट्रहित सर्वोपरि: जयशंकर का दृढ़ संकल्प, भारत अब नहीं झुकेगा!
इतिहास साक्षी है, जो राष्ट्र अपनी संप्रभुता और हितों को गिरवी रख देता है, वह महज़ एक भूली-बिसरी दास्तान बनकर रह जाता है। वर्तमान परिदृश्य में, हमारे विदेश मंत्री, डॉ. एस. जयशंकर, विश्व मंच पर बार-बार इस सत्य को रेखांकित कर रहे हैं: भारत अब किसी बाहरी दबाव के आगे नहीं झुकेगा; वह केवल अपने राष्ट्रहितों के आधार पर ही निर्णय लेगा। हाल ही में एक सभा में, जयशंकर के मुख से निकले शब्दों ने एक बार पुनः स्पष्ट कर दिया कि भारत की विदेश नीति अब नेहरू युग की भावनात्मक धाराओं से निकलकर, ठोस राष्ट्रीय हितों की दिशा में अग्रसर है।
विदेश मंत्री ने, बिना किसी का नाम लिए, अपने ‘नापाक पड़ोसी’ पाकिस्तान पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने कहा, “हमारे कई पड़ोसी हैं, परंतु सभी एक जैसे नहीं हैं। कुछ मित्रवत हैं, तो कुछ कम।”
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जयशंकर ने आगे स्पष्ट किया, “अक्सर ‘हाइफनेशन’ (जुड़ाव) ऐसे पड़ोसियों के साथ होता है जो उतने अच्छे नहीं होते। हमें यह समझना होगा कि जब हम ‘डिहाइफनेशन’ (अलगाव) की बात करते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम चाहते हैं कि अन्य देश, जब भारत के संबंध में कोई निर्णय लें, तो वे उस विशेष पड़ोसी के साथ अपने संबंधों को आधार न बनाएं। अतः, मैं एक ऐसे मुश्किल पड़ोसी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता, चाहे यह सत्य कितना भी अप्रिय क्यों न हो। मेरा कर्तव्य है कि मैं स्वयं को इतना सामर्थ्यवान और प्रभावशाली बनाऊं कि अन्य देशों के साथ हमारे संबंध मुख्य रूप से मेरी क्षमताओं, मेरी विशेषताओं और मेरे योगदान पर आधारित हों। मेरा मानना है कि हम इस दिशा में काफी हद तक सफल हो रहे हैं।”
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श्रीलंका के आर्थिक संकट के समय भारत द्वारा की गई सहायता, तथा मालदीव को वर्तमान में मिल रही मदद, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। हाल के वर्षों में, भारत के पड़ोस में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं। पिछले महीने ही, नेपाल में भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन के परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को पद से हटाया गया, एक कार्यवाहक सरकार का गठन हुआ और नए चुनावों की आहट सुनाई देने लगी।
पिछले वर्ष, बांग्लादेश में ‘जुलाई क्रांति’ ने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया, जो भारत की एक प्रमुख सहयोगी मानी जाती थी। इसके बाद, ढाका में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का शासन स्थापित हुआ। सितंबर 2023 में, मालदीव में मोहम्मद मुइज्ज़ू राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने अपने चुनावी अभियान में “इंडिया आउट” के नारे पर जोर दिया था, हालाँकि राष्ट्रपति बनने के बाद उनके रुख में कुछ नरमी आई है। नई दिल्ली और माले, दोनों देशों के नेताओं की पारस्परिक यात्राओं के माध्यम से, संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं।
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इन घटनाओं के आलोक में, यह स्पष्ट है कि भारत की विदेश नीति अब अपने राष्ट्रहितों की रक्षा के लिए अधिक मुखर और दृढ़ हो गई है। यह एक सकारात्मक बदलाव है, जो देश की बढ़ती वैश्विक महत्ता और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है।
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