बदलती दुनिया का नेतृत्व करता भारत: एस. जयशंकर का विश्लेषण
दुनिया एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, और इस बदलाव की धुरी पर भारत मजबूती से खड़ा है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कोलकाता में एक महत्वपूर्ण संबोधन में वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य का गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि कैसे अमेरिका, जो दशकों से वैश्विक व्यवस्था का सूत्रधार रहा है, अब बिल्कुल नए सिरे से अन्य देशों के साथ जुड़ाव स्थापित कर रहा है।
अमेरिका और चीन: नई विश्व व्यवस्था के दो ध्रुव
जयशंकर के अनुसार, आज की दुनिया में अमेरिका और चीन दोनों ही अन्य देशों के सामने कड़े विकल्प पेश कर रहे हैं। अमेरिका अब पूर्व की भांति नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर देशों से जुड़ रहा है, और अक्सर एक समय में केवल एक ही देश के साथ सौदेबाजी कर रहा है। वहीं, चीन अपनी स्थापित कार्यप्रणाली के अनुसार ही चल रहा है, जिसमें हाल के वर्षों में और भी दृढ़ता आई है। इस स्थिति ने दुनिया के कई देशों को दुविधा में डाल दिया है, वे यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित करें या उन सौदों पर जो इस प्रतिस्पर्धा की आड़ में चुपके से आकार ले रहे हैं।
ग्लोबलाइजेशन का दबाव और ‘हेजिंग की नीति’
वैश्वीकरण के बढ़ते दबाव, सप्लाई चेन की अस्थिरता और जोखिमों में वृद्धि ने देशों को ऐसी रणनीतियां अपनाने पर मजबूर कर दिया है, जो उन्हें हर परिस्थिति के लिए तैयार रख सकें। जयशंकर ने इसे “हेजिंग की नीति” का नाम दिया। इसका अर्थ है कि देश एक ओर अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख खिलाड़ियों के साथ सीधे संवाद बनाए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर वे आपस में भी नए विकल्प और साझेदारियां तलाश रहे हैं। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) में देशों की बढ़ती रुचि इसी प्रवृत्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
सप्लाई चेन की विश्वसनीयता पर सवाल और ऊर्जा का नया परिदृश्य
जयशंकर ने इस बात पर भी जोर दिया कि चीन, जो वैश्विक विनिर्माण का एक तिहाई हिस्सा रखता है, के कारण सप्लाई चेन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अनिश्चितता जोखिमों को बढ़ा रही है। उन्होंने यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व में तेजी से बदलती परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में नए अवसर उभर रहे हैं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रों का विभिन्न क्षेत्रों में सापेक्षिक भार भी बदल रहा है। विनिर्माण, ऊर्जा, व्यापार, वित्त, प्रौद्योगिकी, प्राकृतिक संसाधन, संपर्क और गतिशीलता – ये सभी क्षेत्र एक दशक पहले की तुलना में काफी भिन्न हो गए हैं।
ऊर्जा के क्षेत्र में भी एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अमेरिका, जो कभी जीवाश्म ईंधन का प्रमुख आयातक था, अब एक महत्वपूर्ण निर्यातक बन गया है। वहीं, नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में चीन का दबदबा कायम है।
सहभागिता की कूटनीति और बदलते व्यापार समझौते
जयशंकर ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे देश अब व्यापार समझौतों के माध्यम से अपनी सहभागिता को मजबूत कर रहे हैं। आपूर्ति, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, और यूरोप के साथ होने वाले व्यापार समझौते इसी दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं, जो नई वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हैं।
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