सुपरपावर की नई ‘वार-नीति’: चेतावनियों का दौर खत्म, अब गरज रहे हैं ब्लैक हॉक और चिनूक
अमेरिका ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी विदेश और रक्षा नीति अब केवल कूटनीतिक चेतावनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खुली शक्ति प्रदर्शन और सैन्य दबाव के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है। यूनाइटेड किंगडम के वायुसेना अड्डों पर अमेरिकी सेना के ‘ब्लैक हॉक’ और ‘चिनूक’ जैसे अत्याधुनिक और भारी-भरकम हेलीकॉप्टरों के साथ कई सैन्य विमानों का उतरना इस बात का पुख्ता प्रमाण है। इन विमानों के साथ अमेरिकी विशेष बलों (Special Forces) की इस बड़ी तैनाती ने पूरे यूरोप में हलचल पैदा कर दी है। रक्षा विशेषज्ञ इसे किसी सामान्य युद्धाभ्यास के तौर पर नहीं देख रहे, बल्कि इसे वेनेजुएला में हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के बाद अगले बड़े ऑपरेशनों की तैयारी के रूप में देख रहे हैं।
गौरतलब है कि पिछले सप्ताह वेनेजुएला में अमेरिकी विशेष बलों द्वारा अंजाम दिया गया ऑपरेशन बेहद चौंकाने वाला था। रात के अंधेरे में किए गए उस सटीक और घातक हमले ने सत्ता के गलियारों तक अपनी पहुँच साबित की। इसके तुरंत बाद ब्रिटेन में बढ़ती अमेरिकी सैन्य सक्रियता यह संकेत देती है कि वाशिंगटन अब अपनी सैन्य ताकत को एक साथ कई मोर्चों पर आजमाने के मूड में है। तकनीक की बात करें तो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर सैनिकों को बिजली की रफ़्तार से उतारने और निकालने में माहिर हैं, जबकि चिनूक जैसे विशाल परिवहन हेलीकॉप्टर भारी मात्रा में हथियार और रसद ले जाने की क्षमता रखते हैं। यह घातक संयोजन स्पष्ट करता है कि अमेरिका अब ‘त्वरित प्रहार’ (Quick Strike) और आक्रामक सैन्य अभियानों को अपनी मुख्य रणनीति बना चुका है।
इसी बीच, अमेरिका की नजरें अब उत्तर की ओर, विशेष रूप से ग्रीनलैंड पर टिक गई हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी प्रशासन के तेवर अचानक बेहद तीखे हो गए हैं। भले ही ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन सामरिक दृष्टिकोण से यह आर्कटिक क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण ‘चेकमेट’ मोहरा है। यहाँ से न केवल आर्कटिक समुद्री मार्गों, बल्कि मिसाइल चेतावनी प्रणालियों और पूरे उत्तरी गोलार्ध की सैन्य गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा सकती है। अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी को मजबूत करने के लिए हर संभव विकल्प पर विचार कर रहा है।
हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेतृत्व ने दोटूक शब्दों में कहा है कि यह क्षेत्र न तो ‘बिकाऊ’ है और न ही किसी बाहरी दबाव में झुकने वाला है। यूरोपीय देशों ने भी इस संप्रभुता के मुद्दे पर डेनमार्क का पुरजोर समर्थन किया है। इसके बावजूद, अमेरिका की सैन्य मोर्चाबंदी और बयानबाजी यह दिखाती है कि वह अपने सहयोगियों की आपत्तियों को दरकिनार कर अपने हितों को प्राथमिकता देने के लिए तैयार है।
देखा जाए तो वर्तमान वैश्विक राजनीति में अमेरिका की ये चालें केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि सीधे टकराव का संकेत हैं। ब्रिटेन में तैनात अमेरिकी विमानों की कतारें और ग्रीनलैंड को लेकर दी गई धमकियां एक ही हकीकत बयां करती हैं। ब्लैक हॉक और चिनूक केवल युद्धक मशीनें नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक बन गए हैं जो संवाद के बजाय सैन्य दबाव से समाधान ढूंढना चाहती है। यह रणनीति दुनिया के छोटे और मध्यम देशों के लिए एक डरावना संदेश है कि उनकी संप्रभुता कभी भी किसी महाशक्ति के निशाने पर आ सकती है।
ग्रीनलैंड का विवाद इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। आर्कटिक क्षेत्र धीरे-धीरे भविष्य का युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है। पिघलती बर्फ के बीच नए समुद्री मार्गों, प्राकृतिक संसाधनों और सैन्य ठिकानों पर कब्जा करने की होड़ तेज हो गई है। ग्रीनलैंड इस पूरे खेल की ‘मास्टर की’ है, क्योंकि यहाँ से उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच की सामरिक दूरी काफी कम हो जाती है। मिसाइल रडार और नौसैनिक निगरानी के लिहाज से यह इलाका किसी ‘सोने की खान’ से कम नहीं है, यही वजह है कि अमेरिका यहाँ अपनी पकड़ ढीली नहीं छोड़ना चाहता।
मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या सामरिक हितों की आड़ में किसी मित्र देश की संप्रभुता को चुनौती देना उचित है? यदि आज ग्रीनलैंड पर दबाव बनाया जा रहा है, तो कल किसी और क्षेत्र की बारी हो सकती है। यह रवैया न केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि भरोसे पर टिके वैश्विक गठबंधनों की नींव को भी कमजोर करता है। जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश ही नियमों को तोड़ने लगे, तो दूसरों से संयम की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यूरोप की वर्तमान बेचैनी इसी डर का परिणाम है। यूरोपीय देश समझ रहे हैं कि अमेरिकी सैन्य आक्रामकता केवल विरोधियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह सहयोगियों को भी अपनी शर्तों पर झुकने के लिए विवश कर सकती है। यह स्थिति वैश्विक शक्ति संतुलन को बिगाड़ सकती है और छोटे देशों को अपनी सुरक्षा के लिए नए सैन्य गुटों की तलाश की ओर धकेल सकती है।
अंततः, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अमेरिका की यह मौजूदा रणनीति दुनिया को सुरक्षा के बजाय अनिश्चितता की ओर धकेल रही है। शक्ति का बेजा प्रदर्शन और संप्रभुता की अनदेखी एक ऐसे युग की आहट है जहाँ ‘नियम’ नहीं, बल्कि ‘ताकत’ ही सर्वोच्च होगी। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते लगाम नहीं लगी, तो भविष्य केवल तनाव और टकराव से भरा होगा। अब दुनिया को यह तय करना है कि वह कानून के शासन के साथ खड़ी होगी या शक्ति के इस बेलगाम खेल की मूकदर्शक बनी रहेगी।
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