विजय माल्या को बॉम्बे हाई कोर्ट की खरी-खरी: ‘राहत चाहिए तो स्वदेश पधारिए, वर्क फ्रॉम UK नहीं चलेगा’
लंबे समय से ब्रिटेन में शरण लिए ‘किंग ऑफ गुड टाइम्स’ विजय माल्या को बॉम्बे हाई कोर्ट ने आईना दिखा दिया है। गुरुवार को हुई अहम सुनवाई के दौरान जस्टिस ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि अगर माल्या को भारतीय अदालतों से किसी भी तरह की रियायत चाहिए, तो उन्हें सबसे पहले भारत की सरजमीं पर कदम रखना होगा। कोर्ट के सख्त तेवरों ने साफ कर दिया है कि अब “वर्क फ्रॉम होम” (या कहें कि “वर्क फ्रॉम यूके”) वाली दलीलें कानून के सामने नहीं टिकेंगी।
“सिस्टम से दूरी और सिस्टम से फायदा… दोनों साथ नहीं चलेंगे”
सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी बेहद तीखी रही। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि माल्या एक तरफ तो भारतीय कानूनी प्रक्रिया की पकड़ से बच रहे हैं और दूसरी तरफ उसी सिस्टम से अपने लिए सुरक्षा की उम्मीद कर रहे हैं—यह विरोधाभास मुमकिन नहीं है। अदालत ने सीधे शब्दों में संदेश दिया कि सुनवाई के लिए आपकी शारीरिक मौजूदगी (Physical Presence) पहली अनिवार्य शर्त है। आप देश से बाहर रहकर केवल याचिकाओं के जरिए कानूनी व्यवस्था का फायदा नहीं उठा सकते।
आखिर क्या है पूरा कानूनी पेंच?
70 वर्षीय शराब कारोबारी विजय माल्या साल 2016 से ब्रिटेन में जमे हुए हैं, जबकि उन पर भारत में धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के बेहद गंभीर मामले दर्ज हैं। माल्या ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दो मुख्य मोर्चों पर चुनौती दे रखी है:
- खुद को ‘भगोड़ा आर्थिक अपराधी’ (FEO) घोषित किए जाने के आदेश के खिलाफ।
- भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (FEO Act) की संवैधानिक वैधता पर सवाल।
दिलचस्प बात यह रही कि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि माल्या ने इस कानून को चुनौती तभी दी, जब उन पर खुद ‘भगोड़ा’ होने का ठप्पा लग गया।
अदालत का आखिरी मौका और 18 फरवरी की डेडलाइन
चीफ जस्टिस चंद्रशेखर की बेंच ने फिलहाल मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी के लिए टाल दी है, लेकिन जाते-जाते माल्या को एक कड़ा ‘होमवर्क’ दे दिया है। कोर्ट ने उनके वकील को निर्देश दिया है कि वे एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करें, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा हो कि माल्या भारत कब लौट रहे हैं।
कोर्ट ने थोड़ी नरमी दिखाते हुए कहा, “हम अभी आपकी याचिका खारिज नहीं कर रहे हैं, बल्कि आपको खुद को साबित करने का एक मौका और दे रहे हैं। हम यह रिकॉर्ड नहीं करना चाहते कि आप कोर्ट की प्रक्रिया से भाग रहे हैं।” हालांकि, माल्या के सीनियर वकील अमित देसाई ने दलील दी कि पुराने उदाहरणों के आधार पर याचिकाकर्ता की मौजूदगी के बिना भी सुनवाई संभव है, लेकिन कोर्ट फिलहाल इस दलील को स्वीकार करने के मूड में नजर नहीं आ रहा।
अब सबकी नजरें 18 फरवरी पर टिकी हैं। क्या विजय माल्या भारत आने का मन बनाएंगे या उनके वकील कोई नया कानूनी दांव-पेच ढूंढ निकालेंगे? फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपनी लकीर खींच दी है—राहत का रास्ता स्वदेश वापसी से होकर ही गुजरता है।
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