राजनीति के दांव-पेंच या पारिवारिक दरार? रोहिणी के संन्यास का सच

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राजनीति के दांव-पेंच या पारिवारिक दरार? रोहिणी के संन्यास का सच
बिहार हार का साइड इफेक्ट: लालू परिवार में टूट, रोहिणी ने राजनीति से लिया संन्यास, परिवार से भी नाता तोड़ा

बिहार की सियासत में भूचाल: रोहिणी आचार्य का चौंकाने वाला ऐलान, राजनीति और परिवार से नाता तोड़ने की घोषणा

पटना: बिहार के राजनीतिक गलियारों में शनिवार को उस वक्त हड़कंप मच गया जब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता लालू प्रसाद यादव की बेटी और युवा चेहरा तेजस्वी यादव की बहन, रोहिणी आचार्य ने राजनीति और अपने परिवार से नाता तोड़ने का अभूतपूर्व ऐलान किया। यह घोषणा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों के जारी होने के ठीक एक दिन बाद आई, जिसमें महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा।

रोहिणी आचार्य ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखा, “मैं राजनीति छोड़ रही हूँ और अपने परिवार से नाता तोड़ रही हूँ… संजय यादव और रमीज ने मुझसे यही करने को कहा था… और मैं सारा दोष अपने ऊपर ले रही हूँ।” यह बयान चौंकाने वाला है और इसके पीछे की वजहें अभी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन यह चुनावी नतीजों की पृष्ठभूमि में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

राजद का रुख: उतार-चढ़ाव को स्वीकार, गरीबों की आवाज बुलंद रखने का संकल्प

वहीं, 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित हार के एक दिन बाद, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने एक परिपक्व प्रतिक्रिया दी है। पार्टी ने एक्स पर हिंदी में जारी एक पोस्ट में कहा कि राजनीति में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। “जनसेवा एक अनवरत प्रक्रिया है, एक अंतहीन यात्रा है! इसमें उतार चढ़ाव आना तय है। हार में विषाद नहीं, जीत में अहंकार नहीं!” यह बयान पार्टी के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि वह गरीबों की पार्टी है और उनके मुद्दों और आवाज़ों को उठाना जारी रखेगी।

तेजस्वी यादव का नेतृत्व और राजद की राह

इस बीच, बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान, तेजस्वी यादव को महागठबंधन में शामिल सहयोगियों की इच्छा के विपरीत मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना एक बड़ा दांव था। हालांकि, शानदार चुनावी आगाज करने वाली राजद को इस बार अकल्पनीय हार का सामना करना पड़ा। 25 साल की उम्र में उपमुख्यमंत्री बनने के 10 साल बाद, पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी ने भले ही राजद के गढ़ राघोपुर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सतीश कुमार को हराकर व्यक्तिगत जीत हासिल कर ली हो, लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी इस चुनाव में केवल 25 सीटों पर सिमट गई। यह परिणाम पार्टी के भविष्य और नेतृत्व पर निश्चित रूप से सवाल खड़े करता है।


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