‘मानो या ना मानो’ फिल्म समीक्षा: क्या है संभव?
हिंदी सिनेमा में विज्ञान-फाई और दार्शनिक नाटकों का संगम मिलना दुर्लभ है। ऐसे में, ‘मानो या ना मानो – एनीथिंग इज पॉसिबल’ एक अनूठा और साहसिक प्रयास है। यह फिल्म हॉलीवुड क्लासिक ‘ए मैन फ्रॉम अर्थ’ का आधिकारिक हिंदी रूपांतरण है। जानिए इस फिल्म के बारे में इस समीक्षा में।
कहानी एक दोस्ताना, मगर असाधारण माहौल में शुरू होती है। कुछ दोस्त अपने साथी वंश मेहता की जन्मदिन की पार्टी और इतिहास के प्रोफेसर मानव कुमार की विदाई के अवसर पर एकत्र होते हैं। बातचीत और हंसी-मजाक के बीच, मानव अचानक एक ऐसा सच उजागर करता है, जिसे सुनकर सभी हैरान रह जाते हैं। वह दावा करता है कि उसकी उम्र पिछले 14,000 वर्षों से नहीं बढ़ी है और वह इसी पृथ्वी पर हजारों सालों से जीवित है। इस बात पर कुछ लोग हंस पड़ते हैं, कुछ संदेह की दृष्टि से देखते हैं, और कुछ उसकी बातों के छिपे अर्थों से सत्य की खोज शुरू कर देते हैं। फिल्म का सारा तनाव इसी प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या मानव सच बोल रहा है, या यह सब एक बौद्धिक खेल है? यह रहस्य फिल्म को अंत तक रोमांचक बनाए रखता है।
फिल्म का सबसे प्रभावशाली पहलू इसका निर्देशन है। पूरी कहानी एक ही स्थान पर घटित होती है, लेकिन योगेश पगारे के निर्देशन ने यह साबित किया कि एक स्थान भी एक संपूर्ण सिनेमाई अनुभव प्रदान कर सकता है। कैमरे की गति, संवादों की गहराई, और कलाकारों के बीच का तनाव – इन सभी ने यह सुनिश्चित किया कि दर्शक एक पल के लिए भी नज़रें न हटा पाएं। 71 मिनट की अवधि में, फिल्म कहीं भी धीमी या भटकी हुई महसूस नहीं होती।
अभिनय की बात करें, तो हितेन तेजवानी ने मानव के जटिल और रहस्यमयी किरदार को बेहतरीन ढंग से निभाया है। उनका व्यवहार शांत रहता है, लेकिन समय के साथ उनकी आँखों में छिपी कहानी दर्शकों को उन पर विश्वास करने को मजबूर करती है। राजीव ठाकुर वंश के रूप में प्रभावशाली हैं और अपने वन-लाइनर्स व हास्यबोध से माहौल को हल्का करते हैं। शिखा मल्होत्रा मेघना के रूप में अपनी छाप छोड़ती हैं, और निहार ठक्कर, पूर्णिमा नवानी, हंसी श्रीवास्तव व संजीव शुबा श्रीकर अपने-अपने किरदारों में सटीक बैठते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका संक्षिप्त और केंद्रित होना है। 70 मिनट में, दर्शकों को न तो खींची हुई कहानी मिलती है और न ही अनावश्यक दृश्य। यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो संवाद-प्रधान, दार्शनिक और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियों को पसंद करते हैं। यदि कोई एक्शन, मसाला या ग्लैमर की तलाश में है, तो यह फिल्म उनके स्वाद की नहीं। लेकिन, यदि कोई व्यक्ति जीवन, समय, अस्तित्व और अमरता जैसे सवालों के उत्तर खोजने में रुचि रखता है, तो यह फिल्म उसे अंत तक बांधे रखती है।
कुल मिलाकर, ‘मानो या ना मानो – एनीथिंग इज पॉसिबल’ विश्व सिनेमा जैसी संवेदनशील कहानी का एक दिलचस्प भारतीय रूपांतरण है। हितेन तेजवानी का अभिनय और योगेश पगारे का निर्देशन मिलकर इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनाते हैं। संक्षिप्त, तीक्ष्ण और दिमाग में सवाल छोड़ने वाला सिनेमा – मानो या ना मानो, एक बार देखना तो बनता है।
फिल्म समीक्षा: मानो या ना मानो – एनीथिंग इज पॉसिबल
कलाकार: हितेन तेजवानी, राजीव ठाकुर, शिखा मल्होत्रा
निर्देशक: योगेश पगारे
रेटिंग: 3.5 स्टार्स
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