पुरस्कारों से परे मनोज वाजपेयी का अभिनय: “जोरम” और “बंदा” के प्रशंसित प्रदर्शनों पर अभिनेता का दृष्टिकोण
बॉलीवुड के मंझे हुए कलाकार मनोज वाजपेयी, हाल ही में अपनी दो प्रशंसित फिल्मों “जोरम” और “सिर्फ एक बंदा काफी है” में बेहतरीन अभिनय के बावजूद, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में वैसी सराहना न मिलने से जरा भी निराश नहीं हैं। उनका मानना है कि वे अपने काम से कभी कोई उम्मीद नहीं रखते, खासकर पुरस्कार समारोहों से।
चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित वाजपेयी ने “जोरम” में एक फरार आदिवासी व्यक्ति, दसरू के किरदार को बड़े ही सजीव ढंग से निभाया, जिसकी खूब तारीफ हुई। वहीं, “सिर्फ एक बंदा काफी है” में एक शक्तिशाली धर्मगुरु को चुनौती देने वाले वकील के रूप में उनके अभिनय ने भी दर्शकों और समीक्षकों का दिल जीता। यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ संवाद के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने में सफल रही।
जब उनसे पूछा गया कि क्या राष्ट्रीय पुरस्कारों में अपने अभिनय के लिए उन्हें कोई मलाल है, तो वाजपेयी ने कहा कि यह सवाल उनके लिए जवाब देना कठिन है। उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं अपने काम से, खासकर पुरस्कार समारोहों से, कुछ भी उम्मीद नहीं करता। सभी पुरस्कारों का स्तर गिर रहा है, वे विश्वसनीयता खो रहे हैं। इसी वजह से, मैं कभी भी उम्मीद नहीं करता।”
साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “एक बात जो कभी नहीं भूली जाएगी, वह यह है कि ‘जोरम’ एक बेहतरीन फिल्म है, जिसे सभी स्वीकार करेंगे। यह एक ऐसा अभिनय है जिसे मैं देखना पसंद करूंगा। जब मैं इसे देखता हूं, तो मुझे लगता है कि यह मैं नहीं हूं। यही वह एहसास है जिसके लिए कोई जीता है, और ऐसा करने के लिए किसी ने बहुत खून-पसीना बहाया है।”
अभिनेता ने आगे कहा कि कई पुरस्कार समारोहों ने अपना नजरिया बदल दिया है। “लेकिन वे ऐसा ही चाहते हैं, मुझे कोई शिकायत नहीं है। मैं कौन होता हूं इसकी शिकायत करने वाला? ये उनका पुरस्कार है, ये उनका फैसला है।”
वाजपेयी का यह बयान जहाँ उनके विनम्र स्वभाव को दर्शाता है, वहीं यह भी रेखांकित करता है कि कला की सच्ची कद्र वोटों की गिनती या पुरस्कारों की ट्रॉफी से कहीं बढ़कर है। उनके लिए, दर्शकों का प्यार और अपने काम से मिला संतुष्टि का भाव ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।
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