
युगांडा की सियासत में एक बार फिर पुराने दिग्गज योवेरी मुसेवेनी का परचम लहराया है। शनिवार को कंपाला में चुनाव आयोग ने घोषणा की कि 81 वर्षीय मुसेवेनी ने 72% वोटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की है। वहीं, पॉप स्टार से राजनेता बने उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी बोबी वाइन महज 24% वोटों पर सिमट गए। यह मुसेवेनी की लगातार पांचवीं चुनावी फतह है, लेकिन यह जीत जश्न से ज्यादा आरोपों और हिंसा के शोर में लिपटी है। बोबी वाइन ने इस चुनाव को ‘बड़े पैमाने पर धांधली’ करार देते हुए समर्थकों से सड़कों पर उतरने का आह्वान किया है। सत्ता पर मुसेवेनी के अटूट कब्जे के बीच अब सबसे बड़ा सवाल उनकी उम्र और उत्तराधिकार को लेकर खड़ा हो गया है।
मुसेवेनी का अजेय शासन: 1986 से अब तक
योवेरी मुसेवेनी का सत्ता के साथ रिश्ता दशकों पुराना है; वह 1986 में एक सैन्य विद्रोह के जरिए गद्दी पर बैठे थे। सत्ता पर अपनी पकड़ को फौलादी बनाने के लिए उन्होंने संविधान में दो बार संशोधन कर राष्ट्रपति पद के लिए आयु और कार्यकाल की सीमाओं को ही खत्म कर दिया। 2021 में भी उन्होंने बोबी वाइन को 58% वोटों से हराया था, हालांकि उस चुनाव की निष्पक्षता पर अमेरिका ने गंभीर सवाल उठाए थे। इस बार भी चुनाव की राह लहू-लुहान रही। वाइन की रैलियों को सुरक्षा बलों ने आंसू गैस और गोलियों के दम पर रोका, जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई और सैकड़ों समर्थकों को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
आधी रात का छापा और बोबी वाइन का पलायन
रॉबर्ट क्यागुलान्यी, जिन्हें दुनिया बोबी वाइन के नाम से जानती है, फिलहाल अज्ञात स्थान पर छिपे हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि वह अपने घर पर हुई सैन्य कार्रवाई से किसी तरह बच निकलने में कामयाब रहे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर आपबीती सुनाते हुए उन्होंने लिखा कि मगेरे स्थित उनके घर पर सेना और पुलिस ने धावा बोला, बिजली काट दी और सीसीटीवी कैमरों को निष्क्रिय कर दिया। वाइन के अनुसार, जबकि वह सुरक्षित निकल गए, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य अब भी घर के भीतर नजरबंद हैं। इस घटना ने युगांडा के तनावपूर्ण माहौल को और अधिक गरमा दिया है।
STATEMENT
Last night was very difficult at our home in Magere. The military and police raided us. They switched off power and cut off some of our CCTV cameras. There were helicopters hovering over.
I want to confirm that I managed to escape from them. Currently, I am not at… pic.twitter.com/P1sKic3kCL
— BOBI WINE (@HEBobiwine) January 17, 2026
पश्चिमी देशों की मजबूरी या मुसेवेनी की जरूरत?
हैरानी की बात यह है कि मानवाधिकार उल्लंघन की तमाम चिंताओं के बावजूद पश्चिमी देश मुसेवेनी का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं। सोमालिया जैसे अशांत क्षेत्रों में सेना भेजने और लाखों शरणार्थियों को पनाह देने की नीति ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ‘जरूरी सहयोगी’ बना दिया है। देश के भीतर भी एक बड़ा वर्ग उन्हें स्थिरता का प्रतीक मानता है। इन समर्थकों का मानना है कि मुसेवेनी ने अराजकता से जूझ रहे युगांडा को शांति दी है और इसी ‘अनुभव’ के भरोसे उन्होंने इस बार भी अपनी चुनावी नैया पार लगाई है।
विरासत की जंग: मुसेवेनी के बाद कौन?
युगांडा के गलियारों में अब यह चर्चा आम है कि मुसेवेनी की विरासत कौन संभालेगा। अटकलें हैं कि वह अपने बेटे और सेना प्रमुख मुहूजी काइनरुगाबा को सत्ता की चाबी सौंपने की तैयारी कर रहे हैं, हालांकि वह आधिकारिक तौर पर इससे इनकार करते रहे हैं। स्काई न्यूज को दिए एक बेबाक साक्षात्कार में जब उनसे सत्ता छोड़ने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने पलटकर कहा, “मैं अभी उपलब्ध हूं। न मैं मरा हूं, न मानसिक रूप से कमजोर। मेरे पास अनुभव और ज्ञान का भंडार है। अगर आप अपने देश के प्रति गंभीर हैं, तो आप इस अनुभव का लाभ क्यों नहीं लेना चाहेंगे?”
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