डायबिटीज के दलदल से निकलने की राह: ‘वर्ल्ड डायबिटीज डे’ पर एक जागरूकता सेमिनार
अहमदाबाद, गुजरात: हाल ही में, अहमदाबाद के चांगोदर स्थित श्रीमती एन.एम.पाडालिया फार्मेसी कॉलेज में “वर्ल्ड डायबिटीज डे” के पावन अवसर पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। “डायबिटीज केयर तक पहुंच–एक अधिकार, न कि कोई खास अधिकार” विषय पर आयोजित इस सेमिनार की अध्यक्षता कॉलेज के मैनेजिंग ट्रस्टी और गुजरात के जाने-माने समाजसेवी उद्योगपति मगनभाई पटेल ने की। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य छात्रों में डायबिटीज, इसके वैश्विक बढ़ते बोझ, और रोकथाम, पहचान तथा इलाज की समान उपलब्धता के महत्व के प्रति जागरूकता पैदा करना था।
सेमिनार में डॉ. गौरांग शाह और डॉ. विनय दरजी को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया था। कॉलेज के प्रिंसिपल और कन्वीनर डॉ. जितेंद्र भंगाले तथा ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. नेहाल त्रंबडिया ने भी सेमिनार में गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। सेमिनार के सफल संकलन का श्रेय प्रो. सूरज चौहान को जाता है। आयोजन समिति में कॉलेज के फैकल्टी सदस्य डॉ. भूमि रावल, डॉ. नुसरत शेख, डॉ. विश्व पटेल, डॉ. स्वीटी चौधरी और प्रो. फोरम पटेल भी सक्रिय रूप से शामिल थे। इस सेमिनार में कुल 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लेकर इसे सफल बनाया। दीप प्रज्जवलन के साथ कॉलेज के मैनेजिंग ट्रस्टी मगनभाई पटेल और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने सेमिनार का उद्घाटन किया।
मगनभाई पटेल की कलम से डायबिटीज का विस्तृत चित्र
अध्यक्षता करते हुए मगनभाई पटेल ने डायबिटीज के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि “डायबिटीज मेलिटस” शब्द ग्रीक “डायबिटीज” (साइफन-पासिंग) और लैटिन “मेलिटस” (मीठा) से मिलकर बना है। प्राचीन सभ्यताओं ने मूत्र के मीठेपन को पहचाना था, जिसने इस शब्द को जन्म दिया। 1889 में मेरिंग और मिंकोव्स्की ने पैंक्रियास की भूमिका का पता लगाया, और 1922 में बैंटिंग, बेस्ट और कोलिप ने इंसुलिन की खोज के साथ डायबिटीज के प्रभावी इलाज का मार्ग प्रशस्त किया।
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इतनी प्रगति के बावजूद, डायबिटीज आज भी दुनिया भर में एक गंभीर क्रोनिक मेटाबोलिक डिसऑर्डर बनी हुई है, जिसमें इंसुलिन की कमी या उसका प्रभावी ढंग से उपयोग न हो पाने के कारण रक्त शर्करा का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है। यह अमेरिका में मृत्यु का सातवां सबसे बड़ा कारण है। डायबिटीज मेलिटस (DM) में रक्त शर्करा का स्तर असामान्य रूप से बढ़ जाता है, और इसके कई प्रकार हैं, जिनमें टाइप-1, टाइप-2, MODY, गर्भावधि डायबिटीज, नवजात डायबिटीज और अन्य कारण शामिल हैं। मुख्य रूप से टाइप-1 (बच्चों और किशोरों में) और टाइप-2 (वयस्कों में, अक्सर जीवनशैली से जुड़ा) डायबिटीज प्रमुख हैं। दोनों के कारण, लक्षण और उपचार भिन्न होते हैं।
पैंक्रियास की भूमिका और डायबिटीज के प्रकार
मगनभाई पटेल ने पैंक्रियास के बीटा सेल्स (इंसुलिन उत्पादक) और अल्फा सेल्स (ग्लूकागन उत्पादक) की भूमिका को समझाया, जो रक्त शर्करा के संतुलन को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं। डायबिटीज की स्थिति में, इंसुलिन की कमी या प्रतिरोध के कारण यह संतुलन बिगड़ जाता है।
- टाइप-1 डायबिटीज (T1DM): यह ऑटोइम्यून प्रक्रिया द्वारा बीटा सेल्स के नष्ट होने से होता है, जिससे इंसुलिन का उत्पादन बहुत कम या बंद हो जाता है।
- टाइप-2 डायबिटीज (T2DM): इसमें इंसुलिन प्रतिरोध और उसके बाद इंसुलिन की कार्यात्मक कमी होती है। मोटापा और उम्र बढ़ने के साथ इंसुलिन प्रतिरोध बढ़ता है।
आनुवंशिकी और जीवनशैली का जटिल संगम
दोनों प्रकार की डायबिटीज में आनुवंशिक पृष्ठभूमि एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। मानव जीनोम की खोज से डायबिटीज से जुड़े विभिन्न लोकाई का पता चला है। T1DM में मेजर हिस्टोकंपैटिबिलिटी कॉम्प्लेक्स (MHC) और ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (HLA) प्रमुख हैं। T2DM में, आनुवंशिकी और जीवनशैली का एक जटिल अंतर्संबंध होता है, जिसमें हेरेडिटरी प्रोफाइल T1DM से अधिक मजबूत होता है। मोनोजायगोटिक जुड़वां बच्चों में, यदि एक प्रभावित है, तो दूसरे को T2DM होने की 90% संभावना होती है।
डायबिटीज के विभिन्न रूप: एक व्यापक अवलोकन
- टाइप-1 डायबिटीज (T1DM): यह इंसुलिन पर निर्भरता से पहचाना जाता है, जो आमतौर पर किशोरावस्था या बचपन में होता है और दैनिक इंसुलिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है। 2017 में, दुनिया भर में 9 मिलियन लोग इससे प्रभावित थे।
- टाइप-2 डायबिटीज (T1D2): यह तब होता है जब शरीर इंसुलिन का ठीक से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है। मोटापा, व्यायाम की कमी और अनियमित खान-पान इसके मुख्य कारण हैं। समय पर निदान और उपचार इसके गंभीर प्रभावों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। 95% से अधिक डायबिटीज के मामले टाइप-2 होते हैं।
- गर्भावस्थाजन्य डायबिटीज (Gestational Diabetes): यह गर्भावस्था के दौरान होता है, जिससे माँ और बच्चे दोनों के लिए भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। इसका निदान प्रीनेटल स्क्रीनिंग से होता है।
- इम्पेयर्ड ग्लूकोज टॉलरेंस (IGT) और इम्पेयर्ड फास्टिंग ग्लाइसीमिया (IFG): ये सामान्य और डायबिटीज के बीच की अवस्थाएं हैं, जिनमें टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
रोकथाम और प्रबंधन: जीवनशैली में बदलाव की ओर
मगनभाई पटेल ने टाइप-2 डायबिटीज को रोकने या विलंबित करने के लिए जीवनशैली में बदलाव पर जोर दिया। नियमित वजन बनाए रखना, प्रति सप्ताह कम से कम 150 मिनट व्यायाम, स्वस्थ भोजन, मीठे और वसायुक्त भोजन से परहेज, और तंबाकू व शराब से दूरी बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
डायबिटीज के उपचार और दीर्घकालिक प्रभाव
टाइप-1 डायबिटीज के लिए इंसुलिन इंजेक्शन आवश्यक हैं, जबकि टाइप-2 डायबिटीज के प्रबंधन में मेटफॉर्मिन, सल्फोनिल्यूरिया जैसी दवाएं और कभी-कभी इंसुलिन इंजेक्शन का उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दवाओं की आवश्यकता हो सकती है। डायबिटीज से हृदय, आंख, किडनी और नसों को गंभीर नुकसान हो सकता है, जिससे अंधापन, किडनी फेलियर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और पैरों में अल्सर जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
भारत में डायबिटीज का बढ़ता बोझ: एक गंभीर चेतावनी
“द लैंसेट” की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 101 मिलियन लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं, और 136 मिलियन लोग प्री-डायबिटीज की श्रेणी में हैं। यदि प्री-डायबिटीज का तुरंत इलाज न किया जाए, तो अगले पांच वर्षों में 60% लोग डायबिटीज के मरीज बन सकते हैं। प्री-डायबिटीज को 20 दिनों के सही प्रयासों से नियंत्रित किया जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय डायबिटीज फेडरेशन (IDF) के अनुसार, 2025 तक दुनिया भर में 589 मिलियन और 2050 तक 853 मिलियन लोग डायबिटीज से प्रभावित हो सकते हैं। वर्तमान में, विश्व की 11.1% आबादी डायबिटीज से पीड़ित है, और 40% से अधिक लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2022 में 18 वर्ष और उससे अधिक आयु के 14% वयस्कों को डायबिटीज था, जो 1990 में 7% था। 2021 में, डायबिटीज 1.6 मिलियन मौतों का सीधा कारण था, और 530,000 मौतें किडनी रोग के कारण हुईं।
“अंदर से बाहर तक डायबिटीज को समझना”: डॉ. गौरांग शाह का ज्ञानवर्धक प्रवचन
मुख्य अतिथि डॉ. गौरांग शाह ने “अंदर से बाहर तक डायबिटीज को समझना” विषय पर अपने संबोधन में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने इंसुलिन की भूमिका, डायबिटीज के पैथोफिजियोलॉजी, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज के बीच अंतर, और जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों पर प्रकाश डाला। उन्होंने गर्भावधि डायबिटीज और प्री-डायबिटीज पर भी चर्चा की और फास्टिंग ग्लूकोज व HbA1c जैसे परीक्षणों के माध्यम से शीघ्र पहचान और निदान के महत्व पर जोर दिया।
“Insights into the Pathophysiology of Diabetes Mellitus”: डॉ. विनय दरजी का गहन विश्लेषण
कीनोट स्पीकर, अरिहंत स्कूल ऑफ फार्मेसी एंड बायोटेक रिसर्च इंस्टीट्यूट, गांधीनगर के प्रोफेसर और प्रिंसिपल डॉ. विनय दरजी ने “Insights into the Pathophysiology of Diabetes Mellitus” विषय पर अपने व्याख्यान में इंसुलिन की संरचना, रिसेप्टर स्तर पर इसके कार्य, इंसुलिन प्रतिरोध और डायबिटीज के पैथोफिजियोलॉजी में इसकी भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने डायबिटीज के निदान के लिए मुख्य लक्षणों और मानदंडों पर भी प्रकाश डाला, जो छात्रों के लिए बीमारी की मूलभूत समझ विकसित करने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।
डॉ. जितेंद्र भंगाले: स्वास्थ्य प्रणाली के भविष्य के लिए आह्वान
कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. जितेंद्र भंगाले ने डायबिटीज को एक गंभीर चुनौती बताया और वर्ल्ड डायबिटीज डे के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने छात्रों से भविष्य के स्वास्थ्य पेशेवरों के रूप में वैज्ञानिक समझ, जिम्मेदारी और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, समय पर जांच और तनाव प्रबंधन जैसी सरल आदतों से डायबिटीज को रोकने और नियंत्रित करने की क्षमता पर जोर दिया। इंसुलिन की खोज के 100 वर्षों से अधिक समय के बाद भी लाखों लोगों का सही इलाज से वंचित होना चिंता का विषय है, और उन्होंने स्वास्थ्य पेशेवरों, छात्रों और समाज के सभी सदस्यों से मिलकर जागरूकता फैलाने और पीड़ितों के प्रति सहानुभूति, समझ और समर्थन दिखाने का आग्रह किया।
छात्रों के विचार: डायबिटीज के प्रति जागरूकता का प्रसार
सेमिनार में कॉलेज के छात्रों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए:
- कुर्मी विपुल रंजन: उन्होंने सर फ्रेडरिक बैंटिंग के योगदान को याद करते हुए बताया कि कैसे शहरीकरण, गतिहीन जीवनशैली और अस्वास्थ्यकर आहार के कारण भारत में डायबिटीज का प्रसार तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने इस तथ्य पर चिंता व्यक्त की कि दो में से एक व्यक्ति को अपनी स्थिति का पता नहीं है।
- पटेल हेतवी: उन्होंने डायबिटीज को इंसुलिन की कमी या शरीर द्वारा उसके प्रभावी उपयोग न कर पाने की स्थिति के रूप में समझाया, जिससे रक्त शर्करा का स्तर बढ़ जाता है।
- अभिनव सिंह: उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और विश्व स्तर पर डायबिटीज के आंकड़ों को प्रस्तुत किया और इंसुलिन की खोज का श्रेय सर फ्रेडरिक बैंटिंग को दिया। उन्होंने सामान्य और डायबिटीज के रोगियों के लिए रक्त शर्करा के सामान्य स्तर को भी बताया।
- देव सिंह: उन्होंने टाइप-1 डायबिटीज को बच्चों और युवाओं की एक ऐसी स्थिति के रूप में परिभाषित किया जहां इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देता है, जिससे आजीवन इंसुलिन इंजेक्शन की आवश्यकता होती है।
जीवनशैली और डायबिटीज: एक सीधा संबंध
छात्रों ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक जीवनशैली, जंक फूड और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। रोज 40 मिनट पैदल चलना और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों से बचना डायबिटीज जैसी “शाही बीमारी” से बचाव का प्रभावी तरीका है। यह बीमारी दिमाग, दिल, किडनी और नसों पर गंभीर प्रभाव डालती है, इसलिए इस आधुनिक युग में इसे नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है।
प्रतिस्पर्धात्मक गतिविधियों से बढ़ा उत्साह
सेमिनार में पोस्टर प्रेजेंटेशन, क्विज कंपटीशन और इलोक्यूशन कंपटीशन जैसी प्रतिस्पर्धी गतिविधियों का भी आयोजन किया गया, जिसने छात्रों की ऊर्जा और उत्साह को और बढ़ाया। पोस्टर प्रेजेंटेशन में रावल शीतलबेन, मोमिन सकीनाफात्मा एस. और राजपूत जिनल सुनील को क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान मिला। क्विज कंपटीशन में कुर्मी विपुलरंजन एस., लोखर जेतिन जी और सिंह देव आशीष विजयी हुए। इलोक्यूशन कंपटीशन में सिंह अभिनव आर., चौहान नीलेशभाई के. और पटेल हेतवी आर. ने क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया। उपस्थित महानुभावों द्वारा विजेताओं को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। राष्ट्रगान के साथ सेमिनार का समापन हुआ।
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