अनंत शैया पर विश्राम, गगन से भी व्यापक
समस्त ब्रह्मांड के आधार, श्री हरि विष्णु, जिनकी शांति अतुलनीय है, वे शेषनाग की शैया पर विराजमान हैं। जहाँ से भूमि कमल की भांति खिल उठती है, और जिनका स्वरूप आकाश सा सर्वव्यापी है, वे भय का समूल नाश करते हैं। वैकुंठ के अधिपति, श्री हरि विष्णु, धरा के कल्याण हेतु भारतवर्ष की पावन भूमि पर वास करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी धरती पर एक वैकुंठ लोक भी है, जिसे हम जगन्नाथपुरी के नाम से जानते हैं। भारत के किसी भी कोने में रहने वाले व्यक्ति की यह अभिलाषा अवश्य होती है कि जीवन में एक बार जगन्नाथ मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो। यह भारत के प्रत्येक हिन्दू की हार्दिक इच्छा है कि उसे एक बार प्रभु जगन्नाथ के दर्शन का अवसर मिले।
सदियों तक रेत में क्यों दबा रहा जगन्नाथ मंदिर?
उत्कल क्षेत्र के राजा इंद्र देव और उनकी पत्नी रानी गुंडजा ने अत्यंत परिश्रम से भगवान नील माधव के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। हनुमान जी ने भी इस कार्य में उनकी सहायता की थी। देवशिल्पी विश्वकर्मा, एक वृद्ध कारीगर के वेश में पधारे और उन्होंने विधिवत रूप से भगवान जगन्नाथ की प्रतिमाओं की स्थापना की। अब प्रश्न था मंदिर और देव प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा का। इसके लिए योग्यतम ब्राह्मण कौन होगा, इस पर गहन विचार-विमर्श होने लगा। तभी वहां देवर्षि नारद प्रकट हुए। राजा इंद्र देव ने कहा कि चूंकि आप नारायण के सबसे प्रिय भक्त हैं, इसलिए यह दिव्य कार्य आप ही संपन्न करें। नारद ने विनम्रता से कहा कि जब पिता (ईश्वर) स्वयं उपस्थित हों, तो पुत्र का कार्य सबसे उत्तम कैसे हो सकता है? इस विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा तो स्वयं ब्रह्मा जी को ही करनी चाहिए। आप मेरे साथ चलकर उन्हें आमंत्रित करें, वे अवश्य पधारेंगे। यह सुनकर राजा ब्रह्म लोक की यात्रा के लिए तत्पर हुए। रानी गुंडजा ने संकल्प लिया कि जब तक आप लौटकर नहीं आते, मैं प्राणायाम के द्वारा समाधि में रहकर तपस्या करूंगी। राजा इंद्र देव ब्रह्म लोक पहुंचकर ब्रह्मा जी से आग्रह किया। ब्रह्म देव ने राजा की प्रार्थना स्वीकार की और वे उनके साथ उत्कल क्षेत्र पधारे।
जब वे धरती पर लौटे, तब तक अनगिनत सदियां बीत चुकी थीं। इस दौरान, समय की परतें चढ़ने के साथ मंदिर भी रेत के नीचे दब गया था। एक दिन, भीषण समुद्री तूफान आया और इसके प्रभाव से मंदिर का शिखर रेत से बाहर दिखाई देने लगा। इसी समय, राजा इंद्र देव, ब्रह्म देव को लेकर धरती पर आ पहुंचे। रानी गुंडजा को भी अपने पति के लौटने का आभास हुआ और वे समाधि से बाहर निकलीं। तत्पश्चात, ब्रह्म देव ने एक यज्ञ का आयोजन किया और रानी तथा राजा के हाथों जगन्नाथ भगवान की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न करवाई।
प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही, भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ प्रकट हुए और राजा इंद्र देव को कई वरदान प्रदान किए। रानी गुंडजा की ओर मुखातिब होकर उन्होंने कहा कि जिस स्थान पर तुमने तपस्या की, वहीं गुंडजा मंदिर का निर्माण होगा। हम तीनों भाई-बहन तुम्हारे पास आया करेंगे और यह मिलन संसार रथ यात्रा के नाम से जानेगा। इसी कारण, प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है।
प्रधानमंत्री रहते इंदिरा गांधी को नहीं मिली थी प्रवेश की अनुमति
यह बात शायद आपको ज्ञात न हो कि वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई थी। इसका कारण यह था कि इस मंदिर में प्रवेश केवल सनातन हिंदुओं को ही प्राप्त होता है। मंदिर का प्रशासन केवल हिन्दू, सिख, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायियों को ही प्रवेश की अनुमति देता है। अन्य धर्मों के लोगों और विदेशियों के प्रवेश पर सदियों पुराना प्रतिबंध लागू है। यही कारण था कि भारत की प्रधानमंत्री होने के बावजूद, उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। इसका अर्थ यह है कि यदि भारत का प्रधानमंत्री भी हिन्दू न हो, तो वह इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता।
जगन्नाथ मंदिर के पुजारियों के अनुसार, इंदिरा गांधी हिन्दू नहीं, बल्कि पारसी थीं। यही वजह थी कि 1984 में उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया। मंदिर प्रबंधकों का कहना है कि इंदिरा गांधी का विवाह पारसी फिरोज जहांगीर गांधी से हुआ था, और विवाह उपरांत वे तकनीकी रूप से हिन्दू नहीं रहीं। इसी आधार पर उन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश से वंचित रखा गया।
जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं को प्रवेश क्यों वर्जित है?
जगन्नाथ मंदिर के शिलापट्ट पर 5 भाषाओं में यह अंकित है कि यहां केवल सनातन हिंदुओं को ही प्रवेश की अनुमति है।
- वर्ष 2005 में थाईलैंड की महारानी को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया था। वे बौद्ध धर्म की अनुयायी थीं, लेकिन विदेशी होने के कारण उन्हें प्रवेश से रोक दिया गया। केवल भारत के बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति है।
- वर्ष 2006 में स्विट्जरलैंड की एक नागरिक ने जगन्नाथ मंदिर को 1 करोड़ 78 लाख रुपये दान किए थे, लेकिन ईसाई होने के कारण उन्हें भी मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली।
- वर्ष 1977 में इस्कॉन आंदोलन के संस्थापक भक्ति वेदांत स्वामी प्रभुपाद पुरी आए थे, लेकिन उनके अनुयायियों को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया।
20 बार विदेशी हमलावरों द्वारा लूटा गया
जगन्नाथ मंदिर को 20 बार विदेशी हमलावरों ने लूटा है। विशेष रूप से, मुस्लिम सुल्तानों और बादशाहों ने जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों को नष्ट करने के उद्देश्य से ओडिशा पर अनेक बार आक्रमण किए। हालांकि, ये हमलावर भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की तीन प्रमुख मूर्तियों को नष्ट करने में असफल रहे, क्योंकि मंदिर के पुजारियों ने इन मूर्तियों को बार-बार सुरक्षित स्थानों पर छिपा दिया। एक बार तो मूर्तियों को गुप्त रूप से ओडिशा से बाहर ले जाकर हैदराबाद में भी छिपा दिया गया था।
आज के भारत में शायद कोई इस बात पर विश्वास न करे कि हमलावरों के कारण भगवान को अपना मंदिर छोड़ना पड़ा। मंदिर से जुड़े इतिहास का अध्ययन करने वाले विद्वानों का दावा है कि इन हमलों के कारण भगवान जगन्नाथ को 144 वर्षों तक अपने मंदिर से दूर रहना पड़ा।
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