IAS Success Story: बुलंद हौसलों के आगे झुकी किस्मत; मिलिए बुलंदशहर के मानवेंद्र से, जिन्होंने दिव्यांगता को मात देकर रचा इतिहास
कहते हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो किस्मत की लकीरें भी रास्ता छोड़ देती हैं। इस बात को अक्षरशः सच कर दिखाया है बुलंदशहर के 24 वर्षीय जांबाज युवा मानवेंद्र ने। यूपीएससी (UPSC) की इंजीनियरिंग सर्विस परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में 112वीं रैंक हासिल कर मानवेंद्र आज उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं, जो छोटी-मोटी मुश्किलों से हार मान लेते हैं।
मानवेंद्र की यह सफलता इसलिए बेमिसाल है क्योंकि उन्होंने न केवल देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक को क्रैक किया, बल्कि अपनी शारीरिक सीमाओं को भी पीछे छोड़ दिया।
कुदरत ने छीनी शक्ति, तो दिया ‘सुपर IQ’
मानवेंद्र बचपन से ही 50 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। वे न तो ठीक से चल सकते हैं और न ही साफ बोल पाते हैं। उनकी मां रेनू सिंह, जो स्वयं एक स्कूल में प्रिंसिपल हैं, बताती हैं कि जब उन्हें बेटे की शारीरिक अक्षमता का पता चला, तो उन्होंने हार मानने के बजाय उसकी मानसिक शक्ति (IQ) को तराशने का फैसला किया।
ईश्वर ने मानवेंद्र से चलने और बोलने की शक्ति भले ही सीमित कर दी थी, लेकिन उन्हें गजब का ‘सुपर इंटेलिजेंस’ दिया था। इसी प्रखर बुद्धि और रोजाना 18 घंटे की कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने सफलता का एक नया अध्याय लिख दिया है।
Overcoming Physical Challenges, Manvendra Becomes IES, Brings Pride to Bulandshahr with 112th Rank
Manvendra Singh from Bulandshahr has proved that physical limitations can never stop success if there is strong determination. By cracking the country’s toughest UPSC examination…
पिता का साया उठा, पर मां बनीं ढाल
मानवेंद्र का सफर कांटों भरा रहा है। पिता मनोज कुमार के आकस्मिक निधन के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन उनकी मां ने बेटे के हौसले को टूटने नहीं दिया। अपनी नानी के घर रहकर मानवेंद्र ने अपनी पढ़ाई के लिए दिन-रात एक कर दिया। उनकी शैक्षणिक यात्रा हमेशा से ही मेधावी रही है— 10वीं और 12वीं में उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद उन्होंने JEE एडवांस में 63वीं रैंक हासिल कर सबको चौंका दिया था और साल 2024 में IIT पटना से बीटेक की डिग्री प्राप्त की।
जब संकल्प ने भरी ऊंची उड़ान
आज मानवेंद्र एक IES (Indian Engineering Service) ऑफिसर बन चुके हैं। 112वीं रैंक के साथ मिली यह जीत केवल एक पद की प्राप्ति नहीं है, बल्कि उन रूढ़िवादी सोच वालों को करारा जवाब है जो शारीरिक अक्षमता को कमजोरी मानते हैं। मानवेंद्र अपनी इस उपलब्धि का पूरा श्रेय अपनी मां और गुरुजनों को देते हैं। मानवेंद्र की यह गौरवगाथा चीख-चीख कर कह रही है कि सफलता का संबंध शरीर की बनावट से नहीं, बल्कि इंसान के दृढ़ संकल्प और कभी न झुकने वाले जज्बे से होता है।
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