शिमला के संजौली में मस्जिद विवाद: देवभूमि संघर्ष समिति की सील करने की मांग, अदालत के आदेशों की अनदेखी का आरोप
शिमला के उपनगरीय इलाके में स्थित संजौली मस्जिद एक लंबे समय से चले आ रहे विवाद का केंद्र बनी हुई है। देवभूमि संघर्ष समिति ने तत्काल मस्जिद को सील करने की मांग की है। 2024 और 2025 के अदालती आदेशों द्वारा अवैध घोषित की गई इस मस्जिद के पूरे ढांचे को ध्वस्त करने की योजना बनाई गई है, लेकिन इसमें अप्रत्याशित देरी हो रही है। अपनी मांगों पर जोर देते हुए, समिति के सदस्य मंगलवार से संजौली पुलिस चौकी के पास भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी प्रमुख मांगों में उनके सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लेना और मस्जिद की बिजली-पानी की आपूर्ति को तुरंत बंद करना शामिल है।
विरोध प्रदर्शन और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल
समिति द्वारा शुरू किए गए आंदोलन के तहत, दो सदस्यों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की थी। जूस पिलाने के बाद दोनों ने अपना उपवास समाप्त कर दिया, जिससे विरोध में एक संक्षिप्त ठहराव आया। समूह ने अपनी मांगों पर ज़ोर देने के लिए शुक्रवार (21 नवंबर) को एक बड़े पैमाने पर प्रदर्शन की योजना बनाई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि उस दिन किसी भी मुसलमान को मस्जिद में नमाज़ अदा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पिछले शुक्रवार को स्थिति तब और बिगड़ गई जब समिति के सदस्यों ने मस्जिद के अंदर नमाज़ अदा कर रहे मुसलमानों को रोका, जिससे तनाव पैदा हुआ और पुलिस को कुछ प्रदर्शनकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करना पड़ा।
अदालती आदेश और कानूनी स्थिति
शिमला जिला न्यायालय ने शिमला नगर आयुक्त न्यायालय के पहले के फैसले को बरकरार रखा है, जिसने मस्जिद की पूरी संरचना को अवैध घोषित कर दिया था और उसे गिराने का आदेश दिया था। न्यायालय ने निर्माण को अनधिकृत करार देते हुए, संरचना को पूरी तरह से ध्वस्त करने के आदेश की पुष्टि की। इन स्पष्ट अदालती आदेशों के बावजूद, विध्वंस का कार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है। इससे समिति के सदस्यों में निराशा है, जिन्होंने अधिकारियों पर निष्क्रियता का आरोप लगाया है और दावा किया है कि उनके सदस्यों को परेशान किया जा रहा है।
पूर्व विरोध प्रदर्शन और सामुदायिक तनाव
पहले भी इस मामले में विरोध प्रदर्शन हुए हैं, जिनमें 11 सितंबर, 2024 का एक प्रमुख विरोध शामिल है, जिसमें हिंसा और चोटें आई थीं। वर्तमान स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है, क्योंकि समिति अपनी मांगों के पूरा होने तक संघर्ष जारी रखने पर अड़ी हुई है। वहीं, मुस्लिम समुदाय के सदस्य अपने धार्मिक अधिकारों पर ज़ोर दे रहे हैं। प्रशासन अदालती आदेशों को लागू करने और सामुदायिक संवेदनशीलता को संभालने के बीच एक नाजुक स्थिति में फंसा हुआ है।
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