यहाँ है वह लेख, जो अपनी मूल सामग्री को बरकरार रखते हुए, एक नए, सजीव और आकर्षक अंदाज में प्रस्तुत है:
भूमि, संघर्ष और राजनीति का ‘सिंगूर’: जहाँ से टकराव की राजनीति को मिलती है नई दिशा
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर और नंदीग्राम केवल दो स्थान नहीं हैं, ये दो ऐसे कंधे हैं जिन पर चढ़कर ममता बनर्जी ने 2011 में लाल दुर्ग को ध्वस्त कर दिया, जिस पर वाम मोर्चा 34 साल तक काबिज था। इतिहास गवाह है कि जब टाटा मोटर्स ने सिंगूर में प्लांट लगाने और भूमि अधिग्रहण की योजना बनाई, तो वहां की जमीन का दर्द ममता बनर्जी ने अपने आंदोलन का जामा पहनाया और अंततः टाटा मोटर्स को वहां से आंदोलन के दबाव में पीछे हटना पड़ा।
आज दुर्गापुर एक्सप्रेसवे के पास स्थित सिंगूर का वह बंजर इलाका, जहाँ टाटा ने एक समय दुनिया की सबसे सस्ती कार ‘नैनो’ से जुड़ी अपनी परियोजना को बीच में ही छोड़ दिया था, एक बार फिर से बंगाल की राजनीति का केंद्र बिंदु बन गया है। हाल ही में, यहाँ महासमर की नींव रखी गई, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 जनवरी को सिंगूर की धरती से तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर हमला बोला और रोजगार सृजन व औद्योगीकरण के मोर्चे पर उसके रिकॉर्ड पर सवालिया निशान लगाए। इसके जवाब में बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी ने 28 जनवरी को वहीं अपनी ताकत दिखाने का ऐलान किया है।
बीजेपी का हमला: ‘सिंडिकेट टैक्स’ और उद्योग विरोध का आरोप
बीजेपी सिंगूर को टीएमसी की उद्योग विरोधी नीतियों और अव्यवस्था का प्रतीक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पिछले दिनों 3,250 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन करते हुए पीएम मोदी ने साफ कहा कि बंगाल में तब तक उद्योग नहीं आ सकते जब तक कानून का राज स्थापित नहीं होता। भाजपा का आरोप है कि यहाँ हर चीज पर ‘सिंडिकेट टैक्स’ वसूला जा रहा है, और वे इसे खत्म करने की गारंटी देते हैं। इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच, भाजपा ने राज्य की सीमित औद्योगिक वृद्धि को लेकर टीएमसी को घेरने की रणनीति तेज कर दी है। यहाँ तक कि भाजपा ने दावा किया है कि पिछले 14 सालों में पश्चिम बंगाल को 6,688 कंपनियों ने छोड़ दिया है।
TMC का पलटवार: किसानों की लड़ाई बता दी अपनी ‘जीत’
अब इस राजनीतिक घमासान में तृणमूल कांग्रेस ने भी मैदान संभाल लिया है। टीएमसी ने अपने विरोधियों के इस दावे को सिरे से खारिज किया है कि सिंगूर टीएमसी की उद्योग-विरोधी नीति का प्रतीक है। बनर्जी के करीबी नेताओं का कहना है कि सिंगूर तो उनके संघर्ष और किसान समर्थक रुख का प्रतीक है। टीएमसी का तर्क है कि उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई थी, जिसकी बदौलत टाटा समूह को पीछे हटना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट ने भूमि वापसी का आदेश दिया। अब वे पीएम मोदी की घोषणाओं के जवाब में कई परियोजनाओं की सौगात देने जा रहे हैं।
वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ‘बंग्लार बारी’ परियोजना के दूसरे चरण की घोषणा कर सकती हैं, जिससे 16 लाख परिवारों को फायदा होगा। यह केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत फंड रोके जाने के बाद राज्य सरकार का एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जिससे यह संदेश देने की कोशिश होगी कि केंद्र बंगाल के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है। इसके अलावा, सिंगूर औद्योगिक क्षेत्र के लिए ‘वायर-हाउसिंग’ परियोजना (Gas-based housing project) का ऐलान भी किया जा सकता है, ताकि यह साबित हो सके कि उनकी सरकार औद्योगीकरण के खिलाफ नहीं है।
2006: वो साल जिसने बदली बंगाल की तकदीर
समय को पीछे मोड़ते हैं, जब साल 2006 था। वाम मोर्चा ने लगातार सातवीं बार विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से सत्ता हासिल। उस समय के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगीकरण और रोजगार के वादे पर अपना चुनावी घोषणापत्र टिकाया था। जल्द ही, टाटा मोटर्स ने अपनी आर्थिक ‘नैनो कार’ परियोजना के लिए सिंगूर में करीब 1,000 एकड़ जमीन पर निशाना लगाया।
सरकार ने भूमि अधिग्रहण शुरू किया, लेकिन इसका विरोध भी उतनी ही तेजी से शुरू हुआ। स्थानीय किसानों और छोटे राजनीतिक दलों ने इसका जमकर विरोध किया। हालांकि, शुरुआती विरोध के बावजूद टाटा वहां निर्माण कार्य शुरू करने में सफल रही। यही वो समय था जब ममता बनर्जी ने मोर्चा संभाला। उन्होंने उपजाऊ कृषि भूमि को बचाने के नाम पर भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन छेड़ा। जब उन्हें सिंगूर में प्रवेश करने से रोका गया, तो वे कोलकाता लौट आईं और 26 दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठ गईं। इस दौरान उन्हें कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और आम जनता का भारी समर्थन मिला।
साल 2008 में टाटा द्वारा ‘नैनो’ कार का अनावरण और कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को वैध ठहराने के बावजूद आंदोलन जारी रहा। इसके बाद, नंदीग्राम में प्रस्तावित रसायन उद्योग केंद्र के खिलाफ हुए एक अन्य भूमि आंदोलन ने वामपंथी सरकार की मुसीबतें और बढ़ा दीं। तत्कालीन राज्यपाल गोपालकृष्ण गांधी द्वारा तनाव कम करने की कोशिशें भी विफल रहीं। नतीजा यह हुआ कि 2008 के अंत में टाटा मोटर्स ने सिंगूर परियोजना वापस लेने की घोषणा कर दी। उस समय गुजरात में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार थी, और टाटा ने अपना प्लांट सानंद में शिफ्ट कर लिया।
आज की तस्वीर
आज की तारीख में सिंगूर राजनीतिक बयानबाजी का अखाड़ा बना हुआ है। एक ओर बीजेपी इसे ‘विकास की राह में बाधा’ बताकर टीएमसी को घेरने में जुटी है, तो दूसरी ओर टीएमसी इसे ही हथियार बनाकर अपनी ‘जन-विरोधी’ छवि को हटाने और किसान हितैषी होने का दम भर रही है। सिंगूर की धूल भरी जमीन अब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले की रणभूमि बन चुकी है, जहाँ हर बयान एक नई रणनीति का संकेत दे रहा है।
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