सुप्रीम कोर्ट का केंद्र पर कड़ा प्रहार: ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की वैधता पर चालबाज़ी की कोशिश नाकाम
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उसकी उस याचिका पर आड़े हाथों लिया, जिसमें सरकार ने ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को सौंपने की मांग की थी। यह याचिका तब दायर की गई जब याचिकाकर्ताओं की बहस पूरी हो चुकी थी, जिससे सुप्रीम कोर्ट ने इसे “अदालत के साथ चालबाज़ी” करार दिया।
प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सख्त लहजा अपनाते हुए कहा, “हमें भारत सरकार से ऐसी चालबाज़ी की उम्मीद नहीं थी। अदालत के साथ इस तरह का खेल अस्वीकार्य है।” सेवानिवृत्ति के करीब, न्यायमूर्ति गवई ने टिप्पणी की कि केंद्र सरकार का यह रवैया दर्शाता है कि वह उनकी पीठ के समक्ष सुनवाई से बचना चाहती है।
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि उन्होंने याचिकाकर्ताओं के सभी तर्कों को विस्तार से सुना, और अटॉर्नी जनरल ने कभी भी यह उल्लेख नहीं किया कि वे इस मामले को पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपना चाहते हैं। बहस पूरी होने के बाद यह याचिका मात्र देरी की रणनीति प्रतीत होती है।
हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने सफाई देते हुए कहा कि सरकार का कोई अनुचित इरादा नहीं था और मामले में संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न होने के कारण इसे संविधान पीठ के पास भेजना उपयुक्त होगा। लेकिन पीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
न्यायमूर्ति गवई ने इस “आधी रात को दाखिल आवेदन” को “न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़” बताया और कहा कि अब सरकार इस आधार पर सुनवाई को टाल नहीं सकती। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि उन्हें लगता है कि मामला संविधान की गंभीर व्याख्या से जुड़ा है, तो वे स्वयं इसे पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज सकते हैं। फिलहाल, आगे की सुनवाई 7 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है।
केंद्र ने अपने आवेदन में तर्क दिया था कि मामला संविधान की व्याख्या से जुड़े ऐसे प्रश्न उठाता है, जिन पर अनुच्छेद 145(3) के तहत कम से कम पांच न्यायाधीशों की पीठ को विचार करना चाहिए। साथ ही, यह भी सवाल उठाया गया कि क्या सर्वोच्च न्यायालय संसद को किसी विशिष्ट रूप में कानून बनाने का निर्देश दे सकता है, और क्या यह विभाजन सिद्धांत (Doctrine of Separation of Powers) का उल्लंघन नहीं होगा?
मुख्य न्यायाधीश गवई की तीखी टिप्पणी शासन और न्यायपालिका के बीच बढ़ती असहजता का संकेत देती है। जब सर्वोच्च न्यायालय को यह कहना पड़े कि “सरकार अदालत के साथ चालबाज़ी न करे”, तो यह केवल एक संस्था की फटकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के संतुलन पर चिंता की घंटी है। सरकारों को यह समझना होगा कि अदालतें राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि संविधान की प्रहरी हैं।
मुख्य न्यायाधीश की यह फटकार न्यायपालिका की स्वायत्तता और गरिमा की रक्षा का संदेश देती है कि कोई भी सत्ता, चाहे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, न्यायिक प्रक्रिया के साथ “खेल” नहीं सकती। यह वक्त है जब कार्यपालिका को अदालतों से टकराने की बजाय उनके प्रति पारदर्शी और उत्तरदायी बनना चाहिए, क्योंकि अंततः, न्याय ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।
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