ग्रीनलैंड पर ट्रंप के अडिग इरादे: व्हाइट हाउस की दो टूक, यूरोपीय सैनिकों के विरोध से नहीं बदलेगा फैसला।

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ग्रीनलैंड पर ट्रंप के अडिग इरादे: व्हाइट हाउस की दो टूक, यूरोपीय सैनिकों के विरोध से नहीं बदलेगा फैसला।
ट्रंप की प्राथमिकता साफ है; यूरोपीय सैनिकों की वजह से ग्रीनलैंड को हासिल करने का फैसला नहीं बदलेगा.

ग्रीनलैंड पर ट्रंप की अडिग नजर: व्हाइट हाउस ने दोहराया अपना संकल्प, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बताया बेहद जरूरी

व्हाइट हाउस ने गुरुवार को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने (अधिग्रहण) के अपने इरादे पर कायम हैं. व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान राष्ट्रपति की प्राथमिकताओं को रेखांकित करते हुए कहा, “राष्ट्रपति का विजन पूरी तरह साफ है। वह चाहते हैं कि अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करे, क्योंकि उनका मानना है कि यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती के लिए अनिवार्य है।”

यूरोपीय देशों द्वारा ग्रीनलैंड में सैन्य तैनाती की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए लेविट ने स्पष्ट किया कि यूरोप के इस कदम से राष्ट्रपति ट्रंप के फैसले या उनके लक्ष्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है. वह ग्रीनलैंड को अमेरिकी हितों के लिए रणनीतिक रूप से अपरिहार्य मानते हैं.

#WATCH | On Greenland, White House Press Secretary Karoline Leavitt says, “… The President has made his priority quite clear. He wants the United States to acquire Greenland. He thinks it is in our best national security to do that.”

(Source: The White House/YouTube) pic.twitter.com/j7Zf4CobTf

अवेयर मीडिया नेटवर्क

— ANI (@ANI) January 15, 2026

आर्कटिक में सैन्य हलचल: नाटो देशों ने ग्रीनलैंड में शुरू की तैनाती

व्हाइट हाउस का यह बयान ऐसे संवेदनशील समय में आया है जब यूरोपीय नाटो देशों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड में अपने सैन्य कर्मियों को तैनात करना शुरू कर दिया है. नाटो के इस कदम ने रूस को नाराज कर दिया है, जिसने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. गौरतलब है कि हाल ही में वॉशिंगटन में अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारियों के बीच एक उच्चस्तरीय वार्ता हुई थी, लेकिन डेनमार्क ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड के भविष्य को लेकर मौलिक मतभेद अब भी बरकरार हैं.

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने गुरुवार को कहा कि हालांकि आर्कटिक की सुरक्षा के लिए एक वर्किंग ग्रुप का गठन किया जाएगा, लेकिन इससे मुख्य विवाद का समाधान नहीं होगा. एएफपी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि ग्रीनलैंड को अमेरिकी नियंत्रण में लेने की महत्वाकांक्षा अभी भी जीवित है. फ्रेडरिक्सन ने इसे एक गंभीर विषय बताते हुए कहा कि डेनमार्क इस स्थिति को अपने पक्ष में रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी रखेगा.

रणनीतिक मोर्चाबंदी: ग्रीनलैंड में नाटो की बढ़ती मौजूदगी

इस भू-राजनीतिक खींचतान के बीच फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और नॉर्वे ने ग्रीनलैंड की राजधानी ‘नूक’ में सैन्य तैनाती का ऐलान कर दिया है. एएफपी के मुताबिक, इसे एक ‘रिकॉनिसेंस’ (टोही) मिशन का नाम दिया गया है. ग्रीनलैंड के उप-प्रधानमंत्री म्यूट एगेडे ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में यहाँ नाटो की गतिविधियाँ और बढ़ेंगी, जिनमें सैन्य उड़ानें और नौसैनिक अभ्यास शामिल होंगे.

जर्मनी के रक्षा मंत्रालय ने इस मिशन को रूस और चीन से संभावित खतरों के खिलाफ आर्कटिक सुरक्षा की समीक्षा बताया है. वहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पुष्टि की है कि फ्रांसीसी सैनिकों का पहला दस्ता पहले ही मिशन के लिए रवाना हो चुका है. अधिकारियों का कहना है कि ये सैनिक मुख्य रूप से प्रशिक्षण और सुरक्षा आकलन के लिए तैनात रहेंगे.

रूस की चेतावनी: ‘खतरे का बहाना बनाकर हो रहा सैन्य जमावड़ा’

ग्रीनलैंड में नाटो की बढ़ती सक्रियता पर रूस ने कड़ी आपत्ति जताई है. बेल्जियम स्थित रूसी दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा कि यह सैन्य जमावड़ा गंभीर चिंता का विषय है. रूस ने आरोप लगाया कि पश्चिमी गठबंधन मॉस्को और बीजिंग के ‘झूठे खतरे’ का डर दिखाकर इस क्षेत्र का सैन्यीकरण कर रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव नहीं बढ़ाया, तो रूस या चीन इस रणनीतिक द्वीप पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सकते हैं. इन बयानों और सैन्य गतिविधियों ने नाटो के भीतर भी तनाव पैदा कर दिया है. वहीं, ग्रीनलैंड के स्थानीय निवासियों में यह डर बढ़ रहा है कि कहीं उनका शांत क्षेत्र दो महाशक्तियों के बीच होने वाले बड़े भू-राजनीतिक टकराव का अखाड़ा न बन जाए.

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