क्रांतिकारी शोध: अब आलू बोया जाएगा बीज से, बदल जाएगी खेती की सूरत!
सीपीआर इंडिया का अभूतपूर्व शोध अब अपने मुकाम पर पहुंच गया है, जो आने वाले समय में आलू की खेती में क्रांति लाने वाला है। अब तक जिस कंद से आलू की बुवाई होती आई है, उसकी जगह जल्द ही ‘सच्चे आलू के बीज’ लेंगे। यह परिवर्तन आलू की गुणवत्ता, उत्पादन प्रक्रिया और स्वास्थ्य लाभों को पूरी तरह से बदल देगा।
बीज से खेती: बेहतर गुणवत्ता और स्वास्थ्य लाभ का नया द्वार
बीज से आलू उगाने की प्रक्रिया कंद से होने वाली पारंपरिक खेती से कई मायनों में बेहतर है। बीज में आलू के डीएनए-क्रोमोसोम को नियंत्रित करना कहीं अधिक आसान होता है, जिससे आलू की गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार संभव होगा। जीन में किए गए इन बदलावों से आलू के सेवन से ग्लूकोज इंडेक्स में भी कमी आएगी। इसका सीधा मतलब है कि मधुमेह और अन्य संबंधित बीमारियों से जूझ रहे मरीज भी अब बिना किसी डर के आलू का सेवन कर सकेंगे।
सुरक्षा और स्वास्थ्य: सोलानिन, चाकोनिन और कार्बोहाइड्रेट पर नियंत्रण
इस शोध का एक और महत्वपूर्ण पहलू है आलू में हानिकारक तत्वों जैसे सोलानिन, चाकोनिन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को कम करना। इन तत्वों की अधिकता कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है, लेकिन अब इन पर नियंत्रण संभव हो पाएगा। इससे आलू के सेवन से होने वाले संभावित नकारात्मक प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
टीपीएस डिपलाइड विधि: भविष्य की आलू प्रजातियों की शुरुआत
सीपीआर इंडिया ने इस क्षेत्र में अपना शोध सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। अगले साल से टीपीएस डिपलाइड (True Potato Seed Diploid) विधि से तैयार की गई आलू की नई प्रजातियों के बीज किसानों के लिए उपलब्ध होंगे। अभी तक आलू का कंद टेट्रालाइड (Tetraploid) तकनीक से तैयार होता रहा है, जिसमें जीन के चार गुणसूत्र होते हैं। इस विधि में पुरानी प्रजाति के अवांछित गुणधर्मों के आने की भी आशंका बनी रहती है।
परंपरागत खेती से एक बड़ा कदम
आलू, दुनिया भर में उगाई जाने वाली और व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली एक प्रमुख फसल है। लेकिन इसकी खेती आज भी परंपरागत तरीके से, यानी कंद को जमीन में दबाकर ही की जाती है। टेट्रालाइड विधि से तैयार कंदों में जीन के चार गुणसूत्र होते हैं, जो कभी-कभी गुणों में अप्रत्याशित परिवर्तन का कारण बन सकते हैं।
डिपलाइड विधि: सटीक नियंत्रण और बेहतर परिणाम
नए शोध में, आलू के बीज अटालाइड (Aptaloid) की बजाय डिपलाइड (Diploid) विधि से तैयार किए जाएंगे। इसमें जीन के क्रोमोसोम के केवल दो गुणसूत्र होंगे, जिससे विशेषज्ञों को इन्हें अधिक सटीकता से नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। इस तकनीक से आलू के गुणों में सकारात्मक बदलाव आया है और इसका ग्लूकोज इंडेक्स भी सुधारा गया है। ग्लूकोज रिलीज होने की गति को नियंत्रित किया जा सकेगा और कार्बोहाइड्रेट का स्तर भी कम होगा।
मधुमेह और मोटापे के मरीजों के लिए वरदान
इस सुधार से मोटापे और मधुमेह से पीड़ित व्यक्ति भी सामान्य रूप से आलू का सेवन कर सकेंगे। साथ ही, चाकोनिन और सोलानिन जैसे हानिकारक तत्वों को नियंत्रित करने से सिर चकराना, ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं वाले मरीज भी बेझिझक आलू का आनंद ले पाएंगे। यह उन लोगों के लिए भी राहत की खबर है जिन्हें आलू से बढ़े हुए यूरिक एसिड की समस्या होती है।
बदलाव का आगाज़: ‘सच्चे आलू के बीज’ से बुवाई
कृषि विज्ञान केंद्र के प्रधान वैज्ञानिक के अनुसार, अब आलू की बुवाई कंदों की जगह ‘सच्चे आलू के बीज’ से होगी, जो आलू उत्पादन की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव लाएगा। ये बीज, फूल आने के बाद बनने वाली फलियों से प्राप्त होते हैं और सामान्य कंद वाले बीजों से बिल्कुल अलग होते हैं। इन नई किस्मों में बीमारियों का प्रकोप भी कम होगा।
किसानों के लिए नए अवसर
शोध पूरा होने के साथ ही, आने वाले वर्ष में आलू को कंद की बजाय बीज से बोया जाएगा। शुरुआत में इसे ट्रायल के लिए हर राज्य को दिया जाएगा, जिसके बाद किसानों को बीज का आवंटन शुरू हो जाएगा। बीज से आलू बोने पर इसकी गुणवत्ता में असाधारण सुधार देखने को मिल रहा है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट सहित अन्य तत्वों का सफल नियंत्रण शामिल है। इससे न केवल आलू की फसल में बीमारियों का खतरा कम होगा, बल्कि इसके सेवन से भी स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं कम हो जाएंगी।
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