चमकीला बचपन, छुपी प्रतिभा और अनसुनी आवाज़: एक फ़िल्मी सफर
एक बाल कलाकार के रूप में उनका करियर शिखर पर था, मानो सितारे उनके इशारों पर नाच रहे हों। फिर आया वो पल जब उन्होंने बड़े पर्दे पर नायिका के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, पर वो बचपन जैसी जादुई लोकप्रियता दोबारा हाथ न लगी। “देवदास”, “गंगा जमुना”, “कागज के फूल”, और “मुसाफिर” जैसी दिग्गज फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया, लेकिन एक ऐसी भूमिका जिसने उन्हें वयस्क कलाकार के तौर पर वो पहचान दी जिसका वो इंतज़ार कर रही थीं, वो थी 1970 की “सच्चा झूठा”। इस फिल्म में राजेश खन्ना की दिव्यांग बहन के किरदार में उनका मासूम और दिल को छू लेने वाला अभिनय इतना प्रभावी रहा कि दर्शक उन्हें ‘बॉलीवुड की प्यारी बहन’ के नाम से पुकारने लगे।
समय के साथ, जब फिल्मों में उनके कदम कम पड़ने लगे, तो उन्होंने एक नए रास्ते की ओर कदम बढ़ाया – डबिंग की दुनिया। बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि 1980 के दशक में जब श्रीदेवी ने दक्षिण भारतीय सिनेमा से हिंदी में अपनी धाक जमाना शुरू किया, तो शुरुआत में उनकी आवाज़ हिंदी दर्शकों को उतनी रास नहीं आई। यहीं पर कुमारी नाज ने अपनी छुपी प्रतिभा का जलवा दिखाया। श्रीदेवी की शुरुआती सुपरहिट फिल्मों, विशेष रूप से “हिम्मतवाला”, “तोहफा” और “मवाली” में, उन्होंने श्रीदेवी के किरदारों को अपनी आवाज़ दी। उनकी आवाज़ में वो कोमलता और नज़ाकत थी जो श्रीदेवी के भावपूर्ण किरदारों से बिल्कुल मेल खाती थी, और इस तरह उन्होंने पर्दे के पीछे से भी दर्शकों के दिलों में जगह बनाई।
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