सिर्फ 15 साल की उम्र में जब ज्यादातर बच्चे अपनी पढ़ाई और खेलकूद में व्यस्त होते हैं, तब उन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर ऐसा जादू बिखेरा कि बड़े-बड़े दिग्गज भी दंग रह गए। साल 1980 में रिलीज हुई फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ में उनके बेजोड़ अभिनय ने हर किसी का दिल जीत लिया और इस शानदार काम के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके ठीक बाद, 1982 में फिल्म ‘प्रेम रोग’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस का प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। इतनी कम उम्र में बैक-टू-बैक दो बड़े सम्मान हासिल करना उनके चमकदार करियर की एक ऐतिहासिक उपलब्धि बन गया।
सफलता की इस सीढ़ी को चढ़ने के बाद, पद्मिनी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ‘आहिस्ता आहिस्ता’, ‘विधाता’, ‘वो सात दिन’, ‘प्यार झुकता नहीं’, ‘सौतन’, ‘स्वर्ग से सुंदर’ और ‘प्यार के काबिल’ जैसी एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्मों में अपनी कला का लोहा मनवाया। हिंदी सिनेमा के साथ-साथ उन्होंने मराठी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। बीच में कुछ समय के लिए उन्होंने फिल्मों से एक छोटा ब्रेक जरूर लिया, लेकिन जब उनकी वापसी हुई, तो उनका वही पुराना अंदाज फिर देखने को मिला। इसके बाद वह ‘चिमनी पाखर’, ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’, ‘पानीपत’ और ‘प्रवास’ जैसी बेहतरीन फिल्मों में भी नजर आईं और दर्शकों का मनोरंजन जारी रखा।
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