देव दीपावली 2025: 5 नवंबर को मनाएं खुशियों का त्योहार, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व!

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देव दीपावली 2025: 5 नवंबर को मनाएं खुशियों का त्योहार, जानें पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और महत्व!
Dev Deepawali 2025: 4 या 5 नवंबर, कब है देव दीपावली? क्या है पूजा विधि, मुहूर्त और मान्यता? | Dev Deepawali 2025 Kab hai: Know Date, Puja Vidhi and Significance in Hindi

देव दीपावली 2025: दीपों का पर्व, देवताओं के स्वागत की पावन बेला

हर साल कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला ‘देव दीपावली’, दीयों का उत्सव, इस वर्ष 2025 में कब मनाया जाएगा, इसे लेकर कुछ असमंजस की स्थिति बनी हुई है। जहाँ कुछ लोग इसे 4 नवंबर को मनाने की बात कह रहे हैं, वहीं अन्य का मानना है कि यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा।

तिथि का निर्धारण:

दरअसल, इस वर्ष कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि 4 नवंबर को रात 10:48 बजे से शुरू होकर 5 नवंबर को शाम 6:48 बजे तक रहेगी। भारतीय परंपरानुसार, उदयातिथि को महत्व दिया जाता है, इसलिए कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली का पर्व 5 नवंबर 2025 को मनाया जाएगा।

गंगा के घाटों पर दीपों की अद्भुत छटा:

इस पावन अवसर पर गंगा के घाटों पर दीपों की मनमोहक रोशनी का नज़ारा देखने लायक होता है। पूजा का शुभ मुहूर्त 5 नवंबर को शाम 05:15 बजे से रात 07:50 बजे तक रहेगा।

देव दीपावली का महत्व और पौराणिक कथा:

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इस दिन देवतागण स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आकर गंगा स्नान करते हैं, इसीलिए इसे ‘देवताओं की दीपावली’ कहा जाता है। शास्त्रों में वर्णन है कि जब भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, तब सभी देवताओं ने प्रसन्न होकर काशी में दीप जलाकर उनकी स्तुति की थी। उसी दिन से कार्तिक पूर्णिमा को देवताओं के स्वागत में दीप प्रज्वलित करने की परंपरा चली आ रही है।

देव दीपावली का इतिहास:

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर का संहार कर देवताओं को बड़ी विपदा से बचाया था। प्रसन्न होकर देवताओं ने काशी के गंगा तट पर दीप जलाकर विजयोत्सव मनाया था। तभी से यह दिन ‘त्रिपुरारी पूर्णिमा’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। वाराणसी में यह पर्व विशेष रूप से दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट, पंचगंगा घाट और राजेंद्र प्रसाद घाट पर अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है।

पर्व का महत्व:

देव दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। यह भगवान शिव की त्रिपुरासुर पर विजय का स्मरण कराता है। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह पर्व भक्तों के मन में भक्ति, श्रद्धा और सकारात्मकता का संचार करता है।

अस्वीकरण: यह सूचना इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिषी या पंडित की राय जरूर लें।


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