धार्मिक पटल पर एक विशेष दिन: देवउठनी एकादशी 2025 – शुभ आरंभ का प्रतीक
नई दिल्ली: 30 अक्टूबर 2025, गुरुवार, 12:28 यह विशेष दिन, देवउठनी एकादशी, वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशी के रूप में जानी जाती है। इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसी दिन भगवान विष्णु अपनी चार महीने की योग निद्रा से जागते हैं, जो चातुर्मास के अवसान का प्रतीक है। इस शुभ घड़ी के साथ ही मांगलिक कार्यों का पुनः आरंभ हो जाता है। प्रबोधिनी एकादशी या देवउठावनी एकादशी के नाम से भी विख्यात यह पर्व हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है।
चातुर्मास का समापन और शुभ कार्यों का आगाज़:
देव उठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के साथ ही सभी शुभ कार्यों की पुनर्स्थापना होती है और चातुर्मास का समापन होता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य का वास होता है।
एकादशी तिथि और व्रत का विधान:
वर्ष 2025 में देवउठनी एकादशी की तिथि 1 नवंबर को सुबह 9:11 बजे से आरंभ होकर 2 नवंबर को सुबह 7:31 बजे तक रहेगी। इसलिए, देवउठनी एकादशी का व्रत 1 नवंबर को रखा जाएगा। ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
देवउठनी एकादशी की पूजा विधि:
इस पावन दिन, प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। तत्पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को सुसज्जित करें। भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। विष्णु भगवान की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीपक प्रज्ज्वलित करें। तुलसी पत्र, पीले पुष्प, धूप, चंदन और पंचामृत से भगवान की पूजा करें। भगवान विष्णु को शंख, चक्र, गदा, पद्म के प्रतीक स्वरूप पूजन सामग्री अर्पित करें। तत्पश्चात “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। आरती के उपरांत प्रसाद का वितरण करें।
तुलसी विवाह की पवित्र परंपरा:
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु (शालिग्राम) और तुलसी माता का विवाह अत्यंत शुभ माना जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्तियों को पूरे दिन उपवास रखना चाहिए और संध्याकाल में केवल फलाहार ग्रहण करना चाहिए। अगले दिन, द्वादशी को दान-पुण्य करके व्रत का पारण किया जाता है।
नई शुरुआत, सकारात्मकता और शुभ कर्मों का उद्भव:
देवउठनी एकादशी 2025 केवल भगवान विष्णु के जागरण का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि यह नए आरम्भ, सकारात्मकता और शुभ कार्यों के सूत्रपात का भी दिन है। जो भी भक्त पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है और उनके जीवन में सुख-शांति का संचार बना रहता है।
अस्वीकरण: यह जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। वनइंडिया किसी भी प्रकार के इनपुट या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। इसलिए, किसी भी जानकारी को अपनाने से पहले, कृपया किसी योग्य ज्योतिषी या पंडित से परामर्श अवश्य लें।
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