गुरु नानक देव: प्रकाश पर्व की गाथा और सत्य की खोज
सिख धर्म के आदि संस्थापक और सिखों के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव, न केवल सिख समुदाय बल्कि अन्य धर्मों में भी असीम श्रद्धा के पात्र हैं। 1469 में तलवंडी (जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है) में जन्मे गुरु नानक का 556वां प्रकाश पर्व इस वर्ष 5 नवंबर को मनाया जा रहा है। यह पावन पर्व कार्तिक मास की पूर्णिमा को प्रतिवर्ष उत्साहपूर्वक मनाया जाता है, जिसे ‘प्रकाश पर्व’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व की तिथि कार्तिक पूर्णिमा से निर्धारित होने का रहस्य आज भी अनसुलझा है।
बाल्यकाल से ही गुरु नानक की रुचि धार्मिक और आध्यात्मिक चर्चाओं में गहरी थी। पांच वर्ष की आयु में वे अपने साथियों के साथ परमात्मा का कीर्तन करते और एकांत में घंटों उसी में लीन रहते। वे दिखावे से दूर, यथार्थ में जीते थे। जो भी कार्य उन्हें आडंबरपूर्ण लगता, वे उसकी वास्तविकता को समझकर सारगर्भित तर्कों से उसका खंडन करते।
नौ वर्ष की आयु में, जब उनके पिता कालूचंद खत्री ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराने हेतु पुरोहित को बुलाया, तब नानक ने पुरोहित से जनेऊ पहनने के लाभ पर प्रश्न किया। पुरोहित के मोक्ष प्राप्ति के कथन पर नानक ने पूछा कि सूत का बना जनेऊ भला मनुष्य को मोक्ष कैसे दिला सकता है, क्योंकि अंत समय में यह परलोक में साथ नहीं जाता। नानक के इन तर्कों से प्रभावित होकर सभी ने स्वीकार किया कि वे अंधविश्वासों में डूबे हैं।
19 वर्ष की आयु में सुलखनी से विवाह के उपरांत भी, नानक का मन गृहस्थी में न लगा। सांसारिक मायाजाल से दूर रहने का उनका प्रयास जारी रहा। पिता द्वारा व्यवसाय के लिए दिए गए धन को भी उन्होंने साधु-संतों और जरूरतमंदों में बांट दिया और परमात्मा की खोज में घर त्याग दिया। आडंबरों के विरोधी गुरु नानक की यात्राओं का मुख्य उद्देश्य लोगों को परमात्मा का ज्ञान कराना और बाह्य आडंबरों से दूर रखना था। उन्होंने सदैव छोटे-बड़े के भेद को मिटाने का प्रयास किया और निम्न कुल के समझे जाने वाले लोगों को उच्च स्थान दिलाने के लिए संघर्ष किया।
एक बार अमीर भागो मलिक ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। भागो के गरीबों पर अत्याचार को जानते हुए, नानक ने एक मजदूर का निमंत्रण स्वीकार किया। भागो द्वारा अपमानित किए जाने पर, नानक ने समझाया कि उसकी कमाई पाप की है, जबकि मजदूर की कमाई मेहनत की। गुस्से में भागो ने स्वादिष्ट व्यंजनों से मोह का दावा किया, तो नानक ने मजदूर की बासी रोटी को श्रेष्ठ बताया। एक साथ दोनों हाथों में पकड़े भागो के व्यंजन और मजदूर की बासी रोटी को दबाने पर, आश्चर्यजनक रूप से मजदूर की रोटी से दूध की धार निकली और भागो के व्यंजनों से रक्त की। यह देख भागो का अहंकार चूर-चूर हो गया और उसने क्षमा याचना की।
हरिद्वार में गंगा स्नान करते हुए पूर्व दिशा की ओर जल अर्पित करते लोगों को देखकर, नानक ने इसका अंधविश्वास बताते हुए पश्चिम दिशा की ओर जल उलटना शुरू कर दिया। जब लोगों ने इसका कारण पूछा, तो नानक ने कहा कि वे अपने खेतों में पानी दे रहे हैं। जब लोगों ने प्रश्न किया कि इतना दूर पानी कैसे पहुंचेगा, तब नानक ने पूछा कि यदि इतना दूर उनके खेतों तक पानी नहीं पहुँच सकता, तो उनके पूर्वजों तक यह जल कैसे पहुँचेगा। लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गुरु जी से मार्ग दर्शन मांगा।
गुरु नानक देव ने सदैव मानवता के लिए संघर्ष किया और शोषितों-पीड़ितों के उत्थान के लिए प्रयासरत रहे। उनकी वाणी को परमात्मा की वाणी माना गया, जो किसी व्यक्ति, समाज, सम्प्रदाय या राष्ट्र तक सीमित न होकर, सम्पूर्ण मानव जाति और चराचर जगत के लिए उपयोगी उपदेश और शिक्षाएं बन गईं।
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