रामचरितमानस: अध्याय 43 – रहस्योद्घाटन

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रामचरितमानस: अध्याय 43 - रहस्योद्घाटन
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श्री रामचन्द्राय नमः

दिव्य स्तुति:

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः।

कथा सार:

दोहा 125:
सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥

भावार्थ: जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागता है, और यह सोचकर डरता है कि कहीं वह उसे छीन न ले, उसी प्रकार इन्द्र को नारदजी द्वारा अपना राज्य छीने जाने का विचार करके भी लज्जा नहीं आई।

चौपाई 1-4:
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥1॥
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥
रंभादिक सुर नारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥2॥
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥3॥
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥4॥

भावार्थ: जब कामदेव उस आश्रम में पहुँचा, तो उसने अपनी माया से वहाँ वसंत का अद्भुत दृश्य रच दिया। विभिन्न रंग-बिरंगे फूलों से लदे वृक्षों पर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजारने लगे। काम की अग्नि को भड़काने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद, सुगंधित) सुहावनी हवा चलने लगी। रंभा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो कामकला में निपुण थीं, सुंदर गान और विविध क्रीड़ाओं में लीन हो गईं। अपने इन सहायकों को देखकर कामदेव प्रसन्न हुआ और उसने अनेक मायाजाल फैलाए। किन्तु, कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। पापी कामदेव अपने ही नाश के भय से काँप उठा। भला, लक्ष्मीपति भगवान जिसके रक्षक हों, उसकी सीमा को कौन लांघ सकता है?

दोहा 126:
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥

भावार्थ: तब अपने सहायकों सहित कामदेव अत्यंत भयभीत होकर, मन में हार मानकर, अति व्याकुल वचनों में मुनि के चरण जा पकड़े।

चौपाई 1-2:
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥1॥
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥2॥

भावार्थ: नारदजी के मन में जरा भी क्रोध उत्पन्न नहीं हुआ। उन्होंने मधुर वचन कहकर कामदेव को शांत किया। तब मुनि के चरणों में सिर नवाकर और उनकी आज्ञा प्राप्त करके, कामदेव अपने सहायकों सहित लौट गया। इन्द्र की सभा में जाकर मुनि की सुशीलता और अपनी करनी का वर्णन किया। यह सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनि की प्रशंसा कर श्री हरि को प्रणाम किया।

चौपाई 3-4:
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥
मार चरति संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥3॥
बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥4॥

भावार्थ: तब नारदजी शिवजी के पास गए। उनके मन में कामदेव को जीतने का अहंकार था। उन्होंने कामदेव के चरित्र शिवजी को सुनाए। महादेवजी ने उन्हें अत्यंत प्रिय जानकर इस प्रकार उपदेश दिया: “हे मुनि! मैं तुमसे बार-बार विनती करता हूँ कि जिस प्रकार यह कथा तुमने मुझे सुनाई है, उसी प्रकार भगवान श्री हरि को कभी मत सुनाना। यदि कभी इस प्रसंग की चर्चा भी चले, तो उसे छिपा जाना।”

नारद का अभिमान और माया का प्रभाव

दोहा 127:
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥

भावार्थ: यद्यपि शिवजी ने हितकारी उपदेश दिया, पर नारदजी को वह पसंद न आया। हे भरद्वाज! अब इस कौतुक को सुनो, क्योंकि हरि की इच्छा सबसे बलवान है।

चौपाई 1-2:
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए॥1॥
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥2॥

भावार्थ: श्री रामचन्द्रजी जो चाहते हैं, वही होता है, उसके विरुद्ध कोई भी नहीं कर सकता। श्री शिवजी के वचन नारदजी को अच्छे नहीं लगे, तब वे ब्रह्मलोक को चले गए। एक बार, हाथ में सुंदर वीणा लिए, हरि के गुणगान में निपुण मुनिनाथ नारदजी क्षीरसागर को गए, जहाँ वेदों के मस्तकस्वरूप, मूर्तिमान वेदांतत्व, लक्ष्मीनिवास भगवान नारायण विराजते थे।

चौपाई 3-4:
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया॥3॥
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥4॥

भावार्थ: रमानिवास भगवान उठकर बड़े आनंद से उनसे मिले और नारदजी के साथ आसन पर बैठ गए। चराचर के स्वामी भगवान हँसकर बोले- “हे मुनि! आज आपने बहुत दिनों पर दया की।” यद्यपि श्री शिवजी ने उन्हें पहले ही मना किया था, तो भी नारदजी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान को कह सुनाया। श्री रघुनाथजी की माया बड़ी प्रचंड है। जगत में ऐसा कौन है जिसे वह मोहित न कर दे?

दोहा 128:
रुख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥

भावार्थ: भगवान ने कुछ रूखा मुख करके कोमल वचन बोले- “हे मुनिराज! आपका स्मरण करने मात्र से ही मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं (फिर आपके लिए तो कहना ही क्या है!)।”

चौपाई 1-2:
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥1॥
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥2॥

भावार्थ: “हे मुनि! सुनिए, मोह तो उसके मन में होता है, जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यव्रत में तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है?” नारदजी ने अभिमान के साथ कहा- “भगवन! यह सब आपकी ही कृपा है।” करुणानिधान भगवान ने मन में विचारकर देखा कि इनके मन में गर्व का भारी वृक्ष अंकुरित हो गया है।

चौपाई 3-4:
बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मैं सोई॥3॥
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई॥
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी॥4॥

भावार्थ: “मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेंकूँगा, क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा, जिससे मुनि का कल्याण हो और मेरा खेल भी हो।” तब नारदजी भगवान के चरणों में सिर नवाकर चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। तब लक्ष्मीपति भगवान ने अपनी माया को प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो।

शेष अगले प्रसंग में ————-

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥

  • आरएन तिवारी

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