सरस्वती विसर्जन 2025: शुभ मुहूर्त, विधि और ज़रूरी सावधानियाँ

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सरस्वती विसर्जन 2025: शुभ मुहूर्त, विधि और ज़रूरी सावधानियाँ
Saraswati Visarjan 2025: सरस्वती विसर्जन का शुभ मुहूर्त और सही पूजा विधि, नोट कर लें ये जरूरी बातें

नवरात्रि का पांचवा पर्व: विद्या, कला और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती का विसर्जन

शारदीय नवरात्रि का उल्लास अपने चरम पर है, और इस पावन अवसर पर चार दिनों तक देवी सरस्वती का विशेष पूजन किया जाता है। यह परंपरा मुख्य रूप से दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल राज्यों में सदियों से चली आ रही है, लेकिन अब उत्तर भारत में भी माँ सरस्वती के प्रति श्रद्धा का यह स्वरूप दिनों-दिन लोकप्रिय होता जा रहा है। नवरात्रि की सप्तमी तिथि से शुरू होने वाली इस आराधना का समापन नवमी तिथि या फिर विजयादशमी के शुभ दिन माँ सरस्वती के विसर्जन के साथ होता है। इस वर्ष, 02 अक्टूबर को माँ सरस्वती को विदाई दी जाएगी। आइए, इस विशेष अवसर और इसके शुभ मुहूर्त पर एक नज़र डालते हैं।

शुभ मुहूर्त: 02 अक्टूबर, 2025

हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष माँ सरस्वती का विसर्जन 02 अक्टूबर 2025 को किया जाएगा। इस दिन श्रवण नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो विसर्जन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। विसर्जन का शुभ मुहूर्त सुबह 09:13 बजे से दोपहर 03:19 बजे तक रहेगा। यह लगभग 6 घंटे 6 मिनट की अवधि माँ सरस्वती को विसर्जित करने के लिए अत्यंत मंगलकारी मानी जाती है।

सरस्वती पूजन विधि: ज्ञान और कला का आह्वान

माँ सरस्वती के विसर्जन से पूर्व, उनके पूजन का विधान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विसर्जन के दिन, सूर्योदय के साथ ही स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात्, माँ सरस्वती की प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक पूजा स्थल पर स्थापित करें। विधि-विधान से माँ की आराधना आरंभ करें, जिसमें धूप-दीप प्रज्वलित करना, फल, फूल और प्रिय मिष्ठान्न अर्पित करना शामिल है। विशेष रूप से, माँ सरस्वती को साबूदाने की खीर का भोग लगाया जाता है। पूजन के दौरान, माँ की आरती करें और मंत्रों का जाप करें। माँ सरस्वती के बीज मंत्र ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः’ का 108 बार जाप करना विशेष फलदायी माना जाता है, जो साधक को ज्ञान और बुद्धि से परिपूर्ण करता है। अंततः, निर्धारित शुभ मुहूर्त में माँ सरस्वती की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

महत्व: आशीर्वाद और विकास का प्रतीक

माँ सरस्वती की विधि-विधान से पूजा करके, विजयादशमी के दिन उनका विसर्जन करना भक्तों पर माँ का असीम आशीर्वाद बरसाता है। इस आराधना से न केवल ज्ञान और बुद्धि का विकास होता है, बल्कि कला के विभिन्न क्षेत्रों में भी शुभ फल की प्राप्ति होती है। यह विसर्जन एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जिसमें भक्त माँ से प्राप्त ज्ञान और कला के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा पाते हैं।


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