सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: राज्यपालों को बिलों पर जल्द निर्णय लेना होगा, अब अनिश्चितकाल तक लटकाना संभव नहीं!
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए राज्यपालों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा भेजे गए एक संदर्भ पर फैसला सुनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि राज्यपाल विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल तक अपने पास लंबित नहीं रख सकते। अदालत का यह फैसला संघीय ढांचे को मजबूत करने और चुनी हुई सरकारों के कामकाज को सुचारू बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
राज्यपालों के लिए तीन स्पष्ट रास्ते:
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि राज्यपालों के पास विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोके रखने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है। उनके सामने अब केवल तीन ही विकल्प होंगे:
- स्वीकृति: विधेयक को मंजूरी देना।
- पुनर्विचार: विधेयक को एक बार पुनर्विचार के लिए विधानसभा को वापस भेजना।
- राष्ट्रपति के पास भेजना: यदि विधेयक संविधान की मूल भावना के विपरीत प्रतीत होता है, तो उसे राष्ट्रपति के पास अग्रेषित करना।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि विधेयकों को “ड्रॉअर में बंद” करके रखना संवैधानिक गतिरोध पैदा करता है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
“डीम्ड असेंट” की मांग खारिज, राज्यपालों की भूमिका पर स्पष्टता:
संविधान पीठ ने “समय सीमा के बाद स्वतः स्वीकृति” (डीम्ड असेंट) की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था मौजूद नहीं है, और यह शक्ति-पृथक्करण के सिद्धांत के विरुद्ध होगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह स्वयं अनुच्छेद 142 के तहत विधेयकों को मंजूरी नहीं दे सकता, क्योंकि यह विशुद्ध रूप से राज्यपालों और राष्ट्रपति का क्षेत्र है।
अदालत ने राज्यपालों की भूमिका को केवल एक “रबर स्टैंप” की तरह मानने से इनकार कर दिया। निर्णय में कहा गया है कि भले ही चुनी हुई सरकार “ड्राइविंग सीट” पर हो, राज्यपाल की भूमिका पूरी तरह औपचारिक नहीं है। सामान्य परिस्थितियों में, उन्हें मंत्रिमंडल की सलाह का पालन करना होता है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में वे अपने विवेक का प्रयोग कर सकते हैं।
न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश:
यदि राज्यपाल जानबूझकर कोई कदम नहीं उठाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय, विधेयक के गुण-दोष में जाए बिना, उन्हें समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने का सीमित निर्देश दे सकते हैं।
चुनी हुई सरकारों को बड़ी राहत:
केरल, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधेयकों को लंबे समय तक लंबित रखने का विवाद चल रहा था। इस ऐतिहासिक फैसले से अब राज्यपालों पर शीघ्र निर्णय लेने का मजबूत दबाव बनेगा, जिससे चुनी हुई सरकारों को बड़ी राहत मिलेगी और उनका कामकाज निर्बाध रूप से जारी रहेगा।
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