सब्जी के ठेले से कॉमनवेल्थ के मंच तक: झंडू कुमार ने फौलादी जज्बे से जीता भारत का पहला पदक
ग्लासगो: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत की सफलता की कहानी लिखी जा चुकी है और इसका आगाज़ किया है पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने। पुरुषों की हेवीवेट कैटेगरी में झंडू कुमार ने अपनी ताकत का लोहा मनवाते हुए ब्रॉन्ज मेडल पर कब्जा जमाया और इन खेलों में भारत का मेडल खाता खोल दिया। 130.9 पॉइंट्स के साथ तीसरे स्थान पर रहकर उन्होंने तिरंगा लहराया। हालांकि, वह स्वर्ण पदक के बेहद करीब आकर चूक गए, लेकिन उनकी यह जीत किसी गोल्ड से कम नहीं है, क्योंकि यह मेडल वर्षों के संघर्ष और अटूट इच्छाशक्ति का परिणाम है।
पहले दिन की मायूसी के बाद मिली स्वर्णिम मुस्कान
23 जुलाई को भव्य उद्घाटन के बाद 24 जुलाई से खेलों की असली जंग शुरू हुई। शुरुआती मुकाबलों और तीन पैरा पावरलिफ्टिंग इवेंट्स में भारत को खाली हाथ रहना पड़ा, जिससे खेल प्रेमियों में थोड़ी निराशा थी। लेकिन दिन के आखिरी मुकाबले में सबकी निगाहें नेशनल रिकॉर्ड होल्डर झंडू कुमार पर टिकी थीं। झंडू ने न केवल उम्मीदें पूरी कीं, बल्कि भारत को जश्न मनाने का पहला बड़ा मौका भी दे दिया।
ताकत का प्रदर्शन: ऐसे पक्का किया पदक
ग्रुप-बी में शामिल झंडू कुमार ने शुरू से ही आत्मविश्वास दिखाया:
- पहला प्रयास: 181 किलोग्राम वजन उठाकर 124.7 पॉइंट्स के साथ मजबूत शुरुआत की।
- दूसरा प्रयास: 190 किलोग्राम का भार सफलतापूर्वक उठाया और अपना स्कोर 130.9 पॉइंट्स तक पहुंचा दिया।
- तीसरा प्रयास: उन्होंने 196 किलोग्राम की चुनौती ली, लेकिन इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया।
मुकाबले के अंत में नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस (132.8 पॉइंट्स) ने गोल्ड और इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग (131 पॉइंट्स) ने सिल्वर मेडल जीता। झंडू महज कुछ अंकों के फासले से ब्रॉन्ज पर सिमट गए। यदि उनका तीसरा प्रयास सफल होता, तो वह गोल्ड मेडल के सबसे प्रबल दावेदार होते।
पोलियो को मात देकर खड़ा किया हौसलों का हिमालय
झंडू कुमार की सफलता की चमक उनके अतीत के अंधेरों को चीरकर आई है। बिहार के नालंदा (हरनौत) के रहने वाले झंडू को महज पांच साल की उम्र में पोलियो ने अपनी चपेट में ले लिया था। दोनों पैरों से दिव्यांग होने और घर की आर्थिक स्थिति बदहाल होने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
कभी बेची सब्जी, कभी चलाया ई-रिक्शा
एक वक्त ऐसा था जब परिवार का पेट पालने के लिए झंडू ने सड़कों पर सब्जियां बेचीं। बाद में उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर घर की जिम्मेदारी उठाई। दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उन्होंने ट्रेनिंग से नाता नहीं तोड़ा। उनकी यही नियमित मेहनत बाद में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी।
एक सही सलाह और बदल गई किस्मत
झंडू की शारीरिक मजबूती को देखते हुए बिहार के एक खेल अधिकारी ने उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग में हाथ आजमाने को कहा। यह सलाह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। उन्होंने इस खेल में खुद को झोंक दिया और जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाते हुए नेशनल रिकॉर्ड कायम कर दिया।
मेडल के लिए बेच दिया अपना रोजगार
झंडू कुमार के समर्पण की मिसाल इस बात से मिलती है कि नेशनल गेम्स में हिस्सा लेने के लिए जब उनके पास पैसे नहीं थे, तो उन्होंने अपना ई-रिक्शा तक बेच दिया। आज उसी त्याग और तपस्या का फल है कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फलक पर भारत का नाम रोशन किया है। झंडू की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो गरीबी और दिव्यांगता भी रास्ता नहीं रोक सकती।
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