
- सियासी घमासान: मुख्य बातें
- ममता की बैठक का बहिष्कार और फिर सीधे ‘गेट आउट’
- बैठकों से बनाई दूरी, गंवानी पड़ी कुर्सी
- शुभेंदु अधिकारी के धमाके से खुली पोल
- घर का भेदी, लंका ढाए: विभीषण बने विधायक
- नोटिस से पहले ही ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
- फर्जीवाड़े की जांच और सीआईडी का शिकंजा
- ममता का कड़ा संदेश: बगावत की कोई जगह नहीं
- नये सियासी समीकरणों की आहट
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सियासी घमासान: मुख्य बातें
- बहिष्कार के बाद सीधे ‘गेट आउट’: ममता का कड़ा प्रहार
- बैठकों से दूरी पड़ी भारी, अनुशासनहीनता पर गिरी गाज
- शुभेंदु के बयान ने बिगाड़ा खेल, खुल गई पोल
- पार्टी में ही छिपे थे ‘विभीषण’, टीएमसी में मची खलबली
- नोटिस का इंतजार नहीं, सीधे निष्कासन की कार्रवाई
- फर्जी हस्ताक्षर का खेल और सीआईडी की बढ़ती दबिश
- बगावत का डर: ममता बनर्जी का बाकी विधायकों को सख्त संदेश
- बंगाल में नये समीकरण: क्या बदलेगी सत्ता की तस्वीर?
TMC Expels Sandipan Saha and Ritabrata Banerjee: बंगाल की राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया जब ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने अपने दो विधायकों—संदीपन साहा (इंटाली) और रीतब्रत बनर्जी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के गंभीर आरोपों के चलते दोनों की प्राथमिक सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि टीएमसी का यह कड़ा एक्शन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म होने के महज 5 मिनट के भीतर आया। इससे साफ हो गया है कि विधानसभा में हुआ ‘फर्जी हस्ताक्षर का खेल’ अब टीएमसी के लिए बड़ी मुसीबत बन चुका है।
ममता की बैठक का बहिष्कार और फिर सीधे ‘गेट आउट’
विवाद की शुरुआत शनिवार को अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर में हुए हमले के बाद हुई। रविवार को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने आवास पर विधायक दल की एक आपात बैठक बुलाई थी, लेकिन 80 में से केवल 20 विधायक ही वहां पहुंचे। अवेयर मीडिया न्यूज़ ने अपनी रिपोर्ट में पहले ही खुलासा किया था कि इंटाली विधायक संदीपन साहा का फोन स्विच ऑफ था। सोमवार को पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता का चरम मानते हुए उन पर कार्रवाई की मुहर लगा दी।
बैठकों से बनाई दूरी, गंवानी पड़ी कुर्सी
पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षरित निष्कासन पत्र में कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि टीएमसी के टिकट पर जीतने के बावजूद दोनों विधायक नेतृत्व द्वारा बुलाई गई बैठकों से बार-बार नदारद रहे। पत्र में आरोप लगाया गया है कि इन विधायकों की गतिविधियां और बयान सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के हितों को चोट पहुंचा रहे थे, जिसे अब बर्दाश्त करना मुमकिन नहीं था।
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शुभेंदु अधिकारी के धमाके से खुली पोल
इस निष्कासन की असली ‘इनसाइड स्टोरी’ राज्य सचिवालय (नबान्न) के गलियारों से निकलकर आई है। टीएमसी का आदेश जारी होने से चंद मिनट पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मीडिया के सामने एक ऐसा दावा किया जिसने राजनीतिक गलियारों में आग लगा दी।
घर का भेदी, लंका ढाए: विभीषण बने विधायक
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुलासा किया कि विधानसभा सचिवालय को सौंपे गए उस विवादास्पद पत्र, जिसमें शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के लिए ‘फर्जी हस्ताक्षर’ किए गए थे, उसकी शिकायत किसी बाहरी ने नहीं की थी। बल्कि खुद टीएमसी विधायक संदीपन साहा और रीतब्रत बनर्जी ने इस जालसाजी के खिलाफ मोर्चा खोला था।
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नोटिस से पहले ही ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
शुभेंदु के इस खुलासे ने यह साबित कर दिया कि ये दोनों विधायक पार्टी के भीतर रहकर अंदरूनी जानकारियां सरकार और जांच एजेंसियों तक पहुंचा रहे थे। जैसे ही टीएमसी आलाकमान को यह भनक लगी कि इन विधायकों ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ सीआईडी (CID) को पुख्ता सबूत मुहैया कराए हैं, उन्हें बिना किसी नोटिस के तुरंत पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
फर्जीवाड़े की जांच और सीआईडी का शिकंजा
यह पूरा विवाद शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित करने वाले पत्र से उपजा है। आरोप है कि संख्या बल दिखाने के फेर में टीएमसी ने कई विधायकों के जाली दस्तखत कर दिए थे। राज्य का अपराध जांच विभाग (CID) इस मामले में सक्रिय है। इसी कड़ी में अभिषेक बनर्जी को भी नोटिस थमाया गया था, हालांकि उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से फिलहाल भवानी भवन जाने से इनकार कर दिया है।
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ममता का कड़ा संदेश: बगावत की कोई जगह नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संदीपन और रीतब्रत की विदाई महज दो विधायकों का जाना नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी की ओर से बाकी विधायकों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। यह संदेश साफ है—अगर किसी ने भी सरकार या भाजपा के साथ पींगे बढ़ाने की कोशिश की, तो अंजाम यही होगा।
नये सियासी समीकरणों की आहट
इन दो विधायकों के बाहर होने के बाद विधानसभा में आंकड़ों का गणित बदल सकता है। अब ये निष्कासित विधायक खुलकर शुभेंदु सरकार के समर्थन में खड़े हो सकते हैं। टीएमसी के भीतर सुलग रही यह चिंगारी किसी बड़े राजनीतिक विस्फोट में तब्दील होगी या ममता बनर्जी इस ‘डैमेज’ को कंट्रोल कर पाएंगी, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
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