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बांग्लादेश में संवैधानिक महासंग्राम: राष्ट्रपति के गंभीर आरोपों ने हिला दी यूनुस सरकार की नींव
बांग्लादेश की सियासत में एक बार फिर बारूद सुलग उठा है। इस बार टकराव की धुरी बने हैं राष्ट्रपति मोहम्मद शाहबुद्दीन और अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस। राष्ट्रपति शाहबुद्दीन ने मुख्य सलाहकार पर ‘संवैधानिक विद्रोह’ और सत्ता को अस्थिर करने के जो सनसनीखेज आरोप लगाए हैं, उसने ढाका से लेकर वैश्विक गलियारों तक हलचल मचा दी है। बांग्ला दैनिक कालेर कांथो को दिए एक विस्फोटक साक्षात्कार में राष्ट्रपति ने सीधे तौर पर कहा कि यूनुस शासन ने न केवल प्रोटोकॉल तोड़ा, बल्कि देश की संवैधानिक मर्यादाओं की भी धज्जियां उड़ाईं।
राष्ट्रपति का सबसे तीखा हमला संवैधानिक चूक को लेकर है। उन्होंने खुलासा किया कि नियमतः मुख्य सलाहकार को हर विदेश यात्रा से लौटने पर राष्ट्रपति को लिखित जानकारी देनी होती है, लेकिन 14-15 विदेश दौरों के बावजूद यूनुस ने एक बार भी इस औपचारिकता को जरूरी नहीं समझा। शाहबुद्दीन ने व्यथित होते हुए कहा कि उन्हें पूरी तरह ‘अंधेरे’ में रखा गया और उनसे शिष्टाचार भेंट तक नहीं की गई। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति के अपने प्रस्तावित कोसोवो और कतर दौरों पर भी अघोषित रोक लगा दी गई।
आरोप यहीं नहीं थमे। राष्ट्रपति ने 2024 के जनउभार के बाद खुद को पद से हटाने की एक गहरी साजिश का पर्दाफाश किया। उन्होंने दावा किया कि एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश को असंवैधानिक तरीके से उनकी कुर्सी पर बैठाने की कोशिश की गई थी, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण वह योजना विफल रही। 22 अक्तूबर 2024 की उस भयावह रात को याद करते हुए राष्ट्रपति ने बताया कि कैसे ‘बंगभवन’ (राष्ट्रपति निवास) के बाहर उग्र भीड़ ने लूटपाट की कोशिश की थी, जिसके बाद सेना को कमान संभालनी पड़ी। संकट के उस दौर में तीनों सेनाध्यक्षों ने राष्ट्रपति को यह कहकर आश्वस्त किया था कि वह सशस्त्र बलों के ‘सर्वोच्च कमांडर’ हैं और उनकी गरिमा की रक्षा सैन्य ढांचे की प्राथमिकता है।
राष्ट्रपति ने अपने कार्यालय को ‘अलग-थलग’ किए जाने की एक दुखद तस्वीर भी पेश की। उन्होंने आरोप लगाया कि एक साधारण शिष्टाचार भेंट के बहाने बंगभवन के पूरे प्रेस प्रकोष्ठ को ही भंग कर दिया गया। प्रेस सचिव से लेकर फोटोग्राफरों तक को हटा दिया गया, जिससे स्थिति यहाँ तक बिगड़ गई कि राष्ट्रपति कार्यालय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम की जीत पर एक बधाई संदेश तक जारी करने में असमर्थ हो गया। सरकारी विज्ञापनों और विदेशी दूतावासों से राष्ट्रपति की तस्वीरें हटा दी गईं, जिसे शाहबुद्दीन ने उन्हें बेदखल करने की ‘पहली चेतावनी’ करार दिया।
आज बांग्लादेश की राजनीति एक अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है। इन गंभीर आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच सवाल यह है कि क्या देश का संवैधानिक ढांचा इस भीषण टकराव को झेल पाएगा? ढाका की गलियों से उठी यह सियासी आंधी फिलहाल थमने वाली नहीं दिखती। अब पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि मुहम्मद यूनुस की कार्यप्रणाली को लेकर और कौन से बड़े खुलासे होने बाकी हैं।
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