अमेरिका-दक्षिण कोरिया के बीच टैरिफ की जंग में नया मोड़: 25% से 15% की कटौती, बदले में 350 अरब डॉलर का निवेश!
APEC समिट में सामने आई बड़ी डील, ऑटोमोबाइल और पार्ट्स पर शुल्क घटाने पर सहमति
हाल ही में APEC समिट के दौरान अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच टैरिफ को लेकर चल रही तनातनी में एक महत्वपूर्ण हलचल देखने को मिली है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के एक वरिष्ठ सलाहकार, किम योंग-बॉम ने मीडिया से बातचीत में एक बड़ी घोषणा की है। उनके अनुसार, दोनों देशों ने ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर लगने वाले 25% के शुल्क को घटाकर 15% करने पर सहमति जता दी है। यह डील दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को एक नई दिशा दे सकती है।
भारी निवेश के बदले टैरिफ में राहत: 350 अरब डॉलर का बड़ा दांव
किम योंग-बॉम ने इस टैरिफ कटौती के बदले दक्षिण कोरिया द्वारा अमेरिका में 350 अरब डॉलर के विशाल निवेश की योजना को भी हरी झंडी मिलने की जानकारी दी है। यह निवेश दो प्रमुख हिस्सों में बंटा हुआ है: पहला, 200 अरब डॉलर का सीधा नकद निवेश, और दूसरा, 150 अरब डॉलर का शिपबिल्डिंग सेक्टर में सहयोग के रूप में। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह समझौता पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति ली के बीच हुई अनौपचारिक बातचीत का नतीजा है या फिर कोई औपचारिक, हस्ताक्षरित करार।
अवेयर मीडिया नेटवर्क
ट्रंप का 25% टैरिफ वार: एक भूली हुई कहानी?
डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान, दक्षिण कोरिया पर ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर 25% का ‘रिसिप्रोकल टैरिफ’ लगाया गया था। इसके अलावा, स्टील और एल्युमीनियम पर भी 50% तक के भारी शुल्क थोपे गए थे। बाद में, दोनों देशों के बीच इस टैरिफ को 15% तक कम करने की बात हुई थी, लेकिन यह कभी भी किसी कागज़ पर औपचारिक रूप से दर्ज नहीं हो पाया। इसी वजह से टैरिफ का बोझ लगातार बना रहा।
सियोल के लिए क्या है कीमत? अर्थशास्त्रियों में चिंता
दक्षिण कोरिया के भीतर इस विशाल निवेश राशि को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कई अर्थशास्त्री इसे देश की अर्थव्यवस्था पर अत्यधिक दबाव डालने वाले सौदे के रूप में देख रहे हैं। सियोल की सुकमयोंग यूनिवर्सिटी के एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री, शिन से-डॉन ने निक्केई एशिया से बात करते हुए कहा कि राष्ट्रपति ली के लिए 350 अरब डॉलर जैसे भारी बोझ को स्वीकार करना आसान नहीं होगा। उनका मानना है कि ली की कोशिश इस राशि को 200 या 250 अरब डॉलर तक कम करने की होगी, जो कि फिर भी एक बड़ी रकम है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस सौदे की असली चुनौती यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप अपने कड़े रुख से पीछे हटने को तैयार होंगे। कई विश्लेषकों के अनुसार, यह घोषणा सिर्फ एक कूटनीतिक संदेश मात्र हो सकती है, क्योंकि जब तक समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक हर दावा सवालों के घेरे में है।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
