मिडिल ईस्ट में महासंग्राम: क्या ट्रंप का ‘अंकारा सरप्राइज’ खत्म कर देगा इसराइल की हवाई बादशाहत?
कल तक जिसके एक इशारे पर अमेरिका हर सही-गलत फैसले पर मुहर लगा देता था, आज वही इसराइली वजीर-ए-आजम बेंजामिन नेतन्याहू कूटनीति के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं। संकट अब तुर्की की उन दहलीज तक जा पहुंचा है, जहां इसराइल को अपनी ‘हवाई बादशाहत’ के ढहने का खौफ सता रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन से अंकारा के लिए उड़ान भर चुके हैं और 7 जुलाई को तुर्की की जमीन पर उनके कदम रखते ही नेतन्याहू का वो सबसे बड़ा डर हकीकत में बदल सकता है, जो मिडिल ईस्ट में इसराइली सल्तनत को ताश के पत्तों की तरह बिखेरने की ताकत रखता है।
वाशिंगटन के सत्ता गलियारों से ऐसे पुख्ता संकेत मिल रहे हैं कि तुर्की को F-35 स्टेल्थ फाइटर जेट प्रोग्राम में दोबारा शामिल किया जा सकता है। इतना ही नहीं, ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस को 700 मिलियन डॉलर (करीब 70 करोड़ डॉलर) के अत्याधुनिक ‘जनरल इलेक्ट्रिक’ इंजन तुर्की को सौंपने का नोटिफिकेशन पहले ही दे दिया है।
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तुर्की इन शक्तिशाली इंजनों का इस्तेमाल अपने स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान ‘कान’ (KAAN) को आसमान का अपराजेय योद्धा बनाने के लिए करने वाला है। रवाना होने से पहले ट्रंप के इन शब्दों ने तेल अवीव की धड़कनें बढ़ा दी हैं कि वह एर्दोगान के लिए कुछ ‘बड़ा’ करने जा रहे हैं, जिससे तुर्की गदगद हो जाएगा। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर तुर्की के पास F-35 की तकनीक लौटी, तो आसमान में इसराइल की ‘एयर सुपीरियरिटी’ हमेशा के लिए दफन हो जाएगी और पूरे क्षेत्र का रक्षा संतुलन पूरी तरह पलट जाएगा।
इसराइल के लिए झटके सिर्फ ट्रंप की ओर से ही नहीं आ रहे, बल्कि वाशिंगटन की नई लीडरशिप के तेवर भी अब बदले-बदले से हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की हालिया सख्त बयानबाजी ने तेल अवीव की नींद उड़ा दी है। वेंस ने साफ कर दिया है कि अमेरिका अब बिना किसी शर्त के इसराइल की हर जंग का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। अब अमेरिका के लिए ‘नेशनल इंटरेस्ट’ (राष्ट्रीय हित) सर्वोपरि है। इसी बीच, नेतन्याहू और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान के बीच जारी जुबानी जंग ने आग में घी डालने का काम किया है।
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एर्दोगान ने दोटूक चेतावनी दी है कि वे अपनी सरहदों पर ताकत की मनमानी कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। वहीं, नेतन्याहू ने ट्रंप के सामने गुहार लगाई कि तुर्की को ये घातक हथियार न दिए जाएं, लेकिन अमेरिका ने इसराइल की इस गिड़गुड़ाहट को पूरी तरह अनसुना कर दिया है। यह बदलती तस्वीर गवाही दे रही है कि वैश्विक राजनीति की धुरी घूम चुकी है।
इसराइल का वह भ्रम अब टूट रहा है जिसके दम पर वह अमेरिका को अपनी उंगलियों पर नचाता था। तुर्की को इंजन और F-35 की संभावित सौगात देकर ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि वाशिंगटन अब अंकारा को इसराइल की जिद की भेंट नहीं चढ़ाएगा। नेतन्याहू की यह कूटनीतिक शिकस्त क्या भविष्य में इसराइल के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बनेगी? सबकी नजरें अब इस पर हैं कि एर्दोगान से मुलाकात के बाद ट्रंप तुर्की को वो कौन सा ‘गिफ्ट’ देते हैं, जो मिडिल ईस्ट का भूगोल बदल सकता है।
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