जर्मनी की सरज़मीं पर अमेरिकी सेना की मौजूदगी का आगाज़ साल 1945 में, दूसरे विश्व युद्ध के विध्वंस के बीच हुआ था। जब नाजी हुकूमत ने घुटने टेके, तब वहां 16 लाख अमेरिकी जांबाज तैनात थे; हालांकि महज एक साल के भीतर यह तादाद सिमटकर 3 लाख से भी कम रह गई, जिनका मुख्य काम अमेरिकी कब्जे वाले क्षेत्रों का प्रशासनिक ढांचा संभालना था।
जैसे-जैसे शीत युद्ध की तपिश बढ़ी, जर्मनी में अमेरिकी मौजूदगी का स्वरूप भी बदलता गया। अब मकसद नाजीवाद के खात्मे से हटकर जर्मनी को एक ऐसे मजबूत गढ़ के रूप में पुनर्जीवित करना था, जो सोवियत संघ के खिलाफ एक अभेद्य दीवार बन सके। 1949 में नाटो के उदय और पश्चिमी जर्मनी के गठन ने इन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को वहां हमेशा के लिए स्थापित कर दिया।
शीत युद्ध के चरम दौर में, अमेरिका जर्मनी में करीब 50 विशाल सैन्य बेस और 800 से ज्यादा रणनीतिक ठिकानों से अपनी शक्ति का संचालन कर रहा था। इसमें विशाल हवाई अड्डों और बैरकों से लेकर बेहद गोपनीय जासूसी केंद्र तक शामिल थे। 1989 में बर्लिन की दीवार के ढहने और उसके दो साल बाद सोवियत संघ के विघटन ने वैश्विक राजनीति को बदल दिया, जिसके बाद से इनमें से कई ऐतिहासिक सैन्य ठिकाने हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


