भारतीय फार्मा में ‘ग्रीन’ क्रांति: ICRA का दावा, 25% तक पहुंचेगी रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी।

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भारतीय फार्मा सेक्टर में ‘हरित क्रांति’: रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ते कदम और वैश्विक दबाव का असर

भारत का फार्मास्युटिकल जगत अब केवल दवाइयां ही नहीं, बल्कि एक ‘सतत भविष्य’ भी तैयार कर रहा है। ICRA ESG रेटिंग्स लिमिटेड के एक ताज़ा अध्ययन के मुताबिक, यूरोप और ब्रिटेन जैसे विनियमित विदेशी बाजारों से बढ़ते दबाव के कारण भारतीय दवा कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा (RE) को अपनाने और टिकाऊ विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 53 प्रमुख फार्मा कंपनियों के नमूने में स्वच्छ ऊर्जा की खपत वित्त वर्ष 2023 के 17 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 25 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विशेष रूप से, सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री (API) निर्माताओं ने इस दिशा में सबसे लंबी छलांग लगाई है, जहां RE का उपयोग 21 प्रतिशत से बढ़कर 31 प्रतिशत हो गया। वहीं, फॉर्मूलेशन निर्माताओं में यह आंकड़ा 9 से 17 प्रतिशत और एकीकृत कंपनियों में 20 से 30 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

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रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा सबसे सशक्त माध्यम है, हालांकि इसे प्राप्त करने का तरीका काफी मायने रखता है। बड़ी निर्यात-उन्मुख कंपनियां अब पारंपरिक बिजली के बजाय ‘ओपन एक्सेस’ और ‘समूह-कैप्टिव’ (Group-Captive) खरीद मॉडल को प्राथमिकता दे रही हैं। अध्ययन में इस बात पर जोर दिया गया है कि स्थिरता (Sustainability) को अपनाने की यह रफ्तार मुख्य रूप से विदेशी नियमों द्वारा प्रेरित है। यूरोप के EU CSRD, CBAM और ब्रिटेन के NHS नेट ज़ीरो जैसे कड़े मानक अब खरीद प्रक्रिया को सीधे तौर पर कंपनी के पर्यावरणीय प्रदर्शन से जोड़ रहे हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए हरित ऊर्जा अपनाना अनिवार्य हो गया है।

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ICRA के विश्लेषण के अनुसार, रासायनिक प्रक्रियाओं, विलायक पुनर्प्राप्ति (Solvent Recovery) और थर्मल ऊर्जा पर निर्भरता के कारण API निर्माता अभी भी पर्यावरण के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र बने हुए हैं। इनका उत्सर्जन स्तर, फॉर्मूलेशन निर्माताओं की तुलना में तीन से चार गुना अधिक दर्ज किया गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि फॉर्मूलेशन कंपनियों ने उत्सर्जन की तीव्रता में सबसे तेज सुधार दिखाया है। विद्युतीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते प्रयोग की बदौलत इन कंपनियों ने वित्त वर्ष 2023-25 के दौरान अपने उत्सर्जन में लगभग 30 प्रतिशत तक की प्रभावशाली कमी की है।

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पर्यावरणीय चुनौतियों में ‘खतरनाक अपशिष्ट’ (Hazardous Waste) का प्रबंधन अभी भी एक बड़ा मुद्दा है। कुल खतरनाक कचरे में API निर्माताओं की हिस्सेदारी 67 प्रतिशत है, जबकि फॉर्मूलेशन कंपनियां 38 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं। एकीकृत कंपनियों ने अपने बड़े परिचालन और संसाधनों का लाभ उठाते हुए पुनर्चक्रण (Recycling) और अपशिष्ट प्रबंधन में बेहतर परिणाम दिए हैं। कॉर्पोरेट गवर्नेंस के मोर्चे पर भी बदलाव दिख रहा है; लगभग 35 प्रतिशत दवा कंपनियों ने बोर्ड स्तर पर समर्पित ESG समितियां बना ली हैं, जबकि 59 प्रतिशत कंपनियों ने भविष्य के लिए स्पष्ट उत्सर्जन-कमी के लक्ष्य निर्धारित कर लिए हैं।


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