अब अपनी ही शिपिंग बेड़े की मालिक बनेगी इंडियन ऑयल, ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करने के लिए उठाया गया बड़ा कदम
नयी दिल्ली, आठ नवंबर। देश की सबसे बड़ी तेल रिफाइनर कंपनी और सार्वजनिक क्षेत्र की इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी) अब अपनी ऊर्जा आपूर्ति शृंखला पर नियंत्रण और अधिक मजबूत करने जा रही है। इसके तहत कंपनी अपने खुद के कच्चे तेल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) वाहक जहाज खरीदने की योजना बना रही है। यह कदम होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास मालवाहक जहाजों की आवाजाही में हो रहे व्यवधान और आसमान छू रही मालभाड़े की लागत के बीच उठाया गया है। आईओसी के निदेशक (वित्त) अनुज जैन ने दूसरी तिमाही के वित्तीय नतीजों के बाद विश्लेषकों के साथ चर्चा में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कंपनी के निदेशक मंडल ने पहले ही कुछ जहाजों की खरीद को हरी झंडी दे दी है और इसके लिए कई महीने पहले ही निविदाएं (टेंडर) जारी कर दी गई थीं।
चर्चा के दौरान जैन ने जोर देते हुए कहा कि मौजूदा समय की मांग है कि देश की तेल क्षेत्र की कंपनियां पोत परिवहन क्षेत्र पर अपना ध्यान और अधिक केंद्रित करें। उन्होंने यह भी साझा किया कि आईओसी सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत के भीतर ही जहाज निर्माण की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। दरअसल, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य के पास वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही में रुकावट आई है, जिसके बाद सुरक्षित पोत परिवहन क्षमता सुनिश्चित करना देश के लिए बेहद अहम हो गया है।
अपनी मौजूदा व्यवस्थाओं का जिक्र करते हुए जैन ने बताया कि फिलहाल आईओसी के पास एक निश्चित अवधि के लिए किराए पर लिए गए कच्चे तेल के तीन जहाज और एलपीजी के नौ जहाज मौजूद हैं। उन्होंने राहत की बात साझा करते हुए बताया कि इन रणनीतिक व्यवस्थाओं की बदौलत कंपनी को मौजूदा वैश्विक संकट के दौरान लागत में भारी बचत हुई है। हाजिर बाजार (स्पॉट मार्केट) में जहाजों की दरें जहां 8 से 10 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं, वहीं कंपनी द्वारा निश्चित अवधि के लिए किराए पर लिए गए कच्चे तेल के जहाजों की लागत मात्र 2 से 2.50 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास ही आती है।
एलपीजी के मोर्चे पर भी लागत के भारी अंतर को उजागर करते हुए उन्होंने आंकड़ों के जरिए स्थिति स्पष्ट की। जैन ने बताया कि एलपीजी की मालभाड़ा दरें, जो सामान्य दिनों में लगभग 40 अमेरिकी डॉलर प्रति टन हुआ करती थीं, मौजूदा समय में हाजिर बाजार में उछलकर सीधे 160 से 180 अमेरिकी डॉलर प्रति टन तक पहुंच चुकी हैं।
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