कपूर-दत्त युग को भूलती पीढ़ी, मनीष पर जाह्नवी का दिल आया – क्या ये है बॉलीवुड का नया दौर?

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कपूर-दत्त युग को भूलती पीढ़ी, मनीष पर जाह्नवी का दिल आया - क्या ये है बॉलीवुड का नया दौर?
'Gen-Z का राज कपूर-गुरु दत्त जैसे सिनेमा के दिग्गजों को भूलना चिंताजनक' और मनीष पॉल पर फिदा हुईं जाह्नवी

सुभाष घई की चिंता: क्या युवा पीढ़ी भूल रही है सिनेमा के ‘सोच-सम्राट’?

बॉलीवुड के ‘शोमैन’ कहे जाने वाले फिल्म निर्माता सुभाष घई ने भारतीय सिनेमा के बदलते मिजाज पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनकी माने तो, आज की युवा पीढ़ी (जेन-जी) सिनेमा के उन सुनहरे पलों और महान कलाकारों को धीरे-धीरे भूलती जा रही है, जिन्होंने इस कला को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।

अपनी नवीनतम इंस्टाग्राम पोस्ट में, सुभाष घई ने इस बात पर अफसोस जताया है कि राज कपूर और गुरु दत्त जैसे दिग्गजों की विरासत युवा दर्शकों के बीच अपनी चमक खोती जा रही है। उन्होंने साझा किया कि जब वे युवा पीढ़ी से इन महान हस्तियों के बारे में पूछते हैं, तो अक्सर एक पल की खामोशी छा जाती है।

“जब मैं जेनरेशन जी (जेन-जी) से पूछता हूं कि क्या उन्हें राज कपूर और गुरु दत्त जैसे भारतीय सिनेमा के संस्थापक याद हैं, तो वे एक पल के लिए खामोश हो जाते हैं,” घई ने लिखा। “लेकिन जैसे ही मैं 1950 के दशक के उनके गीत गुनगुनाता हूं, जैसे ‘जाने क्या तूने कहीं – जाने क्या मैंने कहीं – बात कुछ बन ही गई’ या ‘प्यार हुआ इकरार हुआ, फिर प्यार से क्यों डरता है दिल,’ वे तुरंत कह उठते हैं, ‘हां, हां – ये तो सदाबहार गीत हैं, जो हम आज भी गाते हैं।’”

यह प्रतिक्रिया घई के लिए एक उम्मीद की किरण है। उन्होंने आगे बताया, “फिर मैंने उन्हें बताया कि हम 8 से 10 अक्टूबर को अपने फिल्म फेस्टिवल में इन दोनों दिग्गजों की शताब्दी मना रहे हैं। यह सुनकर वे उत्साहित हो उठते हैं।”

सुभाष घई की यह बात भारतीय सिनेमा के इतिहास के दो ऐसे नामों का उल्लेख करती है, जिन्होंने अपनी कला से पीढ़ियों को प्रभावित किया है। राज कपूर, जिन्हें ‘भारतीय सिनेमा का शोमैन’ कहा जाता था, एक ऐसे करिश्माई अभिनेता, निर्देशक और निर्माता थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा पर एक अमिट छाप छोड़ी। वहीं, गुरु दत्त, एक बहुआयामी प्रतिभा थे – अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, कोरियोग्राफर और लेखक। वे अपनी कहानी कहने की अनूठी शैली और दूरदर्शी सिनेमाई दृष्टि के लिए भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे महान फिल्म निर्माताओं में से एक माने जाते हैं।

सुभाष घई की यह पोस्ट एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है: क्या हम अपनी सिनेमाई जड़ों से जुड़ पा रहे हैं, या आधुनिकता की दौड़ में हम उन दिग्गजों को पीछे छोड़ रहे हैं जिन्होंने इस विरासत को गढ़ा है?


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