मैथिली की अस्मिता पर संकट! विधायक संजीव झा ने नीतीश कुमार को लिखा पत्र, अकादमी को पुनः जीवित करने की उठाई मांग
आम आदमी पार्टी (आप) के दिल्ली से विधायक संजीव झा ने मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए एक बड़ी पहल की है। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर पटना में 1976 से स्थापित, लेकिन वर्तमान में निष्क्रिय पड़ी ‘मैथिली अकादमी’ को तत्काल पुनः सक्रिय करने का पुरजोर आग्रह किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुद्दे को उठाते हुए झा ने इसे लाखों मैथिली भाषियों की भावनाओं और उनकी पहचान से जुड़ा विषय बताया।
अपने आधिकारिक X हैंडल पर संजीव झा ने लिखा, “मैंने माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी को पत्र भेजकर मैथिली अकादमी को पुनर्जीवित करने की मांग की है। 1976 में स्थापित यह संस्थान मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण का एक प्रमुख स्तंभ रहा है। मैथिली केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा है। अकादमी का बंद पड़ा होना भाषाई उपेक्षा का प्रमाण है। बिहार सरकार को इस पर अविलंब निर्णय लेकर मैथिली की पहचान के साथ न्याय करना चाहिए।”
मुख्यमंत्री को लिखे अपने विस्तृत पत्र में झा ने मैथिली की समृद्ध और गौरवशाली बौद्धिक परंपरा को रेखांकित किया। उन्होंने हिंदी साहित्य के आदिकाल के महाकवि विद्यापति का स्मरण कराया, जिनकी अमर रचनाओं ने मैथिली को वैश्विक पहचान दिलाई। इसके साथ ही उन्होंने गद्य-कविता के प्रथम रचयिता ज्योतिरीश्वर ठाकुर का उल्लेख करते हुए बताया कि मिथिला प्राचीन काल से ही दार्शनिकों और विद्वानों की जन्मस्थली रही है।
संजीव झा ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि जिस अकादमी का उद्देश्य भाषा का संवर्धन था, वह आज बंद पड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही वे वर्तमान में दिल्ली से विधायक हैं, लेकिन मिथिला की मिट्टी, भाषा और संस्कृति से उनका अटूट भावनात्मक जुड़ाव है। यही कारण है कि वे इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता मानते हैं। उन्होंने मांग की कि सरकार न केवल इसे शुरू करे, बल्कि इसके सुचारू संचालन के लिए पुख्ता व्यवस्था भी सुनिश्चित करे।
अपने पत्र के अंत में उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए लिखा, “मैथिली अकादमी की स्थापना 1976 में इसी उद्देश्य से की गई थी कि यह भाषा और साहित्य को नई ऊंचाइयों पर ले जाए। महाकवि विद्यापति और ज्योतिरीश्वर ठाकुर जैसे महान सपूतों की यह भूमि सदैव ज्ञान और संस्कृति की वाहक रही है। ऐसे में इस धरोहर को उपेक्षित छोड़ना उचित नहीं है।”
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