दो दशकों का सबसे अनोखा BMC चुनाव: हार-जीत से परे, मुंबई का नया समीकरण

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दो दशकों का सबसे अनोखा BMC चुनाव: हार-जीत से परे, मुंबई का नया समीकरण
why was this bmc election the most unique in two decades

यहाँ प्रस्तुत है उक्त आर्टिकल का एक नया, आकर्षक और रोचक स्वरूप, जो मूल सामग्री और लंबाई को बनाए रखता है:

मुंबई बीएमसी चुनाव: शिवसेना के गढ़ में बीजेपी का ‘लाल किला’, ठाकरे परिवार का अंतिम वर्चस्व ध्वस्त!

बीएमसी चुनावों में भाजपा-शिव सेना (शिंदे गुट) गठबंधन की ऐतिहासिक विजय ने एक युग के अंत का संकेत दिया है। एशिया के सबसे धनी नगर निकाय पर अब तक काबिज ठाकरे परिवार का लंबा वर्चस्व इस चुनावी नतीजों के साथ ही समाप्त हो गया है। इस जीत के साथ ही 227 वार्डों वाली मुंबई मनपा में लंबे समय बाद भाजपा-शिवसेना (शिंदे) का महापौर मिलना लगभग तय हो गया है।

मुंबई नगर निकाय में भाजपा के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन के चर्चा के केंद्र में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस हैं। फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने अपने पिछले सर्वोच्च (2017 में 82 सीटें) के आंकड़े को पार करते हुए अब तक 88 सीटों पर जीत या बढ़त हासिल कर ली है। इसके साथ ही उसकी सहयोगी शिवसेना (शिंदे) 28 सीटों पर आगे चल रही है, जिससे गठबंधन 114 सीटों के बहुमत के आंकड़े आराम से पार हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा का यह लगभग एकदलीय दबदबा इस बात को रेखांकित करता है कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, शिवसेना की कमान संभालने के बाद से अपने पारंपरिक गढ़ में पार्टी के आधार को बनाए रखने के लिए कितना संघर्ष कर रहे हैं। 2017 में अविभाजित शिवसेना के 84 पार्षदों में से अधिकांश शिंदे के साथ होने के बावजूद, उनका गुट मुश्किल से 30 का आंकड़ा पार कर पाया है।

कई मायनों में अलग

बीएमसी सहित राज्य की 29 महानगर पालिकाओं का यह चुनाव पिछले दो दशक में हुए चुनावों से कई मायनों में अलग रहा। ढाई दशक की सत्ता पर दोबारा काबिज होने के लिए 20 साल बाद शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे प्रमुख राज ठाकरे साथ आए। वहीं, सत्ता के लिए धुर विरोधी माने जाने वाले एआईएमआईएम और बीजेपी का गठबंधन भी सामने आया। इसके अलावा, विचारधारा को त्याग कर कांग्रेस और बीजेपी के हाथ मिलाने की खबरों ने भी खूब सुर्खियां बटोरीं। इसके विपरीत, सत्ताधारी बीजेपी, शिंदे सेना और एनसीपी (अजित पवार गुट) ने कई जगहों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा और जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगाए। जहां उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने 2023 में पार्टी पर कब्जा करने के बाद चाचा शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन कर पुणे महानगरपालिका का चुनाव लड़ा, वहीं चुनाव प्रचार में भी दलों ने काफी अलग-अलग तरीके अपनाए, जिसमें डिजिटल प्रचार पर काफी जोर दिया गया।

अकोट में बीजेपी-एआईएमआईएम का ‘अजीबोगरीब’ गठबंधन

महाराष्ट्र के अकोट में एआईएमआईएम और बीजेपी का गठबंधन इस चुनाव की सबसे अप्रत्याशित घटना रही। हालांकि यह गठबंधन कुछ ही घंटों में टूट गया, लेकिन इससे बीजेपी की काफी किरकिरी हुई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को स्थानीय नेताओं को स्पष्ट निर्देश देना पड़ा कि यह गठबंधन स्वीकार्य नहीं है। फडणवीस ने कहा कि अनुशासनहीनता करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, जिसके बाद बीजेपी ने स्थानीय विधायक प्रकाश भारखासले को कारण बताओ नोटिस भी दिया।

अंबरनाथ में बीजेपी-कांग्रेस का बेमेल गठबंधन

अंबरनाथ में सत्ता के लिए कांग्रेस और बीजेपी के बेमेल गठबंधन की पूरे चुनाव में चर्चा रही। अंबरनाथ नगरपरिषद में बीजेपी और कांग्रेस के हाथ मिलाने से सियासी गलियारों में हलचल मच गई थी। हालांकि यह गठबंधन भी कुछ ही घंटों में टूट गया और निकाले गए 12 पार्षद बीजेपी में शामिल हो गए। इसके उलट उपनगराध्यक्ष पद के चुनाव में शिंदे सेना ने अजित पवार की एनसीपी से मिलकर बीजेपी उम्मीदवार को मात दे दी।

सत्ता में साथ, मगर चुनाव में खिलाफ

सत्ताधारी महायुति (बीजेपी, शिंदे सेना और अजित पवार की एनसीपी) ने राज्य की 29 महानगर पालिकाओं में से कई जगहों पर एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा। मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोबिवली, वसई-विरार, भिवंडी, पनवेल में बीजेपी और शिंदे सेना ने मिलकर चुनाव लड़ा, जबकि नवी मुंबई, मीरा-भाईंदर और उल्हास नगर में दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे। वहीं, अजित पवार की एनसीपी ने महायुति से अलग होकर अकेले चुनाव लड़ा, जबकि पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में अजित और शरद पवार ने साथ मिलकर चुनावी समर लड़ा।


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