डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह एक बार फिर सलाखों से बाहर आने को तैयार हैं। न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के सूत्रों के अनुसार, राम रहीम को 40 दिनों की एक और पैरोल मिल गई है। वर्तमान में वह रोहतक की सुनारिया जेल में अपनी दो शिष्याओं के साथ दुष्कर्म और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या के संगीन जुर्म में 20 साल की कड़ी सजा काट रहे हैं।
हाल के वर्षों में राम रहीम की जेल से बार-बार होने वाली ‘अस्थायी विदाई’ ने एक नई बहस को हवा दे दी है। हैरानी की बात यह है कि ताजा पैरोल, पिछले साल अगस्त में मिली 40 दिनों की छुट्टी के महज कुछ ही महीनों बाद मिली है। अगर बीते एक साल के रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो राम रहीम जनवरी में 30 दिन, अप्रैल में 21 दिन (फरलो) और अगस्त में 40 दिन जेल से बाहर रह चुके हैं। साल 2017 में दोषी करार दिए जाने के बाद से यह 15वां अवसर है, जब डेरा प्रमुख को कानूनी राहत के तहत जेल से बाहर आने का मौका मिला है।
राम रहीम को मिलने वाली इस बार-बार की रियायत पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) जैसे सिख संगठनों ने कड़ा ऐतराज जताया है। इन संगठनों का तर्क है कि एक गंभीर अपराधी को बार-बार पैरोल देना न्याय प्रणाली की मूल भावना को आहत करता है। वहीं, आलोचक इसे राजनीतिक चश्मे से भी देख रहे हैं। चर्चा है कि हरियाणा, पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में डेरा अनुयायियों के बड़े वोट बैंक के कारण, अक्सर चुनावों के इर्द-गिर्द राम रहीम की रिहाई राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर देती है।
विशेष रूप से हरियाणा के सिरसा, फतेहाबाद, कुरुक्षेत्र और हिसार जैसे क्षेत्रों में डेरा का खासा प्रभाव माना जाता है। हालांकि, प्रशासन का दावा है कि पैरोल पूरी तरह जेल नियमावली के तहत दी जा रही है, लेकिन बार-बार खुलते जेल के इन दरवाजों ने कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी दलों के बीच गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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