उत्तर प्रदेश में बंदरों का आतंक: सरकार की चुप्पी पर सवाल

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उत्तर प्रदेश में बंदरों का आतंक: सरकार की चुप्पी पर सवाल
उत्तर प्रदेश में बंदरों की समस्या को लेकर सरकार से जवाब तलब

शहरों में बंदरों का आतंक: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सरकार को लगाई फटकार, मांगा जवाब

प्रयागराज: बंदरों के बढ़ते आतंक ने अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ध्यान खींचा है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की पीठ ने राज्य सरकार की निष्क्रियता पर चिंता व्यक्त करते हुए, प्रदेश के प्रमुख सचिव (शहरी विकास) से इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए उठाए गए या प्रस्तावित कदमों पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है।

न्यायालय ने इस बात पर नाराजगी जताई कि मानव और बंदरों के बीच बढ़ते टकराव को रोकने के लिए विभिन्न सरकारी विभाग अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाल रहे हैं। गाजियाबाद के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 20 अगस्त, 2025 को भेजे गए पत्र के जवाब में राज्य सरकार की तरफ से बंदरों की समस्या के नियंत्रण के लिए कार्य योजना बनाने में देखी गई शिथिलता को अदालत ने गंभीरता से लिया है।

सामाजिक कार्यकर्ता विनीत शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, 19 सितंबर को अदालत ने शहरी विकास विभाग को इस मामले में पक्षकार बनाने का निर्णय लिया, क्योंकि सभी नगर निगम इसी विभाग के अधीन आते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, और अदालत ने आदेश में स्पष्ट किया है कि "अगली तिथि से पूर्व जरूरी चीजें की जाएंगी।"

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि एक ओर जहां आम लोग बंदरों के उपद्रव से परेशान हैं, वहीं दूसरी ओर, भोजन की कमी के कारण बंदर भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति प्रदेश के लगभग सभी जिलों में देखी जा रही है।

अदालत को कौशांबी, प्रयागराज, सीतापुर, बरेली और आगरा जैसे जिलों से हिंसक बंदरों के हमलों से संबंधित समाचारों की रिपोर्टिंग भी दिखाई गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि यह समस्या केवल एक या दो जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य में फैली हुई है।

वकील ने आगे तर्क दिया कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची से बंदरों को बाहर किए जाने के बाद, वे अब नगर निगम अधिनियम के प्रावधानों के तहत आते हैं। इसलिए, बंदरों के उपद्रव को कम करने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दायित्व अब नगर निगमों का है।

इस जनहित याचिका में बंदरों की बढ़ती आबादी, मानव-बंदर टकराव में वृद्धि, भोजन की कमी और उनकी भुखमरी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है। याचिकाकर्ता ने अदालत से तत्काल कार्ययोजना तैयार करने, बंदरों की पर्याप्त देखभाल और परिवहन की व्यवस्था करने, उन्हें जंगल में भेजने के लिए कदम उठाने और एक शिकायत हेल्पलाइन पोर्टल स्थापित करने का निर्देश जारी करने की मांग की है।


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