तानसेन के वंशज उस्ताद अब्दुल राशिद खान: पद्म भूषण पाने वाले संगीत के सबसे उम्रदराज ‘स्वर सम्राट’

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तानसेन के वंशज उस्ताद अब्दुल राशिद खान: पद्म भूषण पाने वाले संगीत के सबसे उम्रदराज 'स्वर सम्राट'
उस्ताद अब्दुल राशिद खानः पद्म भूषण पाने वाले सबसे उम्रदराज संगीतकार, तानसेन के वंशज होने का गौरव

सुरों के ‘बादशाह’ और तानसेन के वारिस: उस्ताद अब्दुल राशिद खान की अमर विरासत

भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश से एक देदीप्यमान सितारा तब ओझल हो गया, जब 18 फरवरी 2016 को 107 वर्ष की सुदीर्घ आयु में उस्ताद अब्दुल राशिद खान ने अंतिम सांस ली। वे न केवल भारत के सबसे बुजुर्ग सक्रिय संगीतकार थे, बल्कि पद्म भूषण से नवाजे जाने वाले सबसे उम्रदराज व्यक्तित्व भी थे। उनके नाम के साथ तानसेन के वंशज होने का वह गौरवशाली इतिहास जुड़ा था, जो उन्हें संगीत जगत में अद्वितीय बनाता था।

उस्ताद अब्दुल राशिद खान का जन्म 19 अगस्त 1908 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली स्थित सलोन के एक प्रतिष्ठित संगीत घराने में हुआ था। ग्वालियर घराने के विख्यात गायक बेहराम खान की विरासत को संजोने वाले इस परिवार में उन्हें संगीत की प्रारंभिक तालीम अपने पिता छोटे यूसुफ खान और चाचा बड़े यूसुफ खान से मिली। तानसेन की 16वीं पीढ़ी का वंशज होने का दावा उनकी संगीत साधना को एक ऐतिहासिक भव्यता प्रदान करता था। उन्होंने खयाल, ध्रुपद, धमार और ठुमरी जैसी जटिल गायन शैलियों पर अद्भुत पकड़ बनाई। उनकी आवाज में गमक, लयकारी और फिरत का वह अनूठा संगम था, जो शुद्ध रूप से ग्वालियर घराने की रूह है।

उस्ताद साहब का जीवन सुरों और साधना का एक जीवंत दस्तावेज था। उनके व्यक्तित्व में आध्यात्मिक गहराई कूट-कूट कर भरी थी; वे नियमित नमाज पढ़ते, कुरान की तिलावत करते और संगीत को ही अपनी सच्ची ‘इबादत’ मानते थे। वर्ष 1973 से उन्होंने कोलकाता की आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी में बतौर रेजिडेंट गुरु अपनी सेवाएं दीं और दो दशकों से अधिक समय तक नई पीढ़ी को तराशा। उम्र के जिस पड़ाव पर लोग मौन साध लेते हैं, वहां भी उनकी आवाज की खनक और ताकत श्रोताओं को सम्मोहित कर देती थी। 100 का आंकड़ा पार करने के बाद भी मंच पर उनकी उपस्थिति और सिखाने का जज्बा कभी कम नहीं हुआ।

साल 2013 में जब उन्हें देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया, तब वे लगभग 105 वर्ष के थे—यह सम्मान पाने वाले वे सबसे बुजुर्ग भारतीय बने। संगीत नाटक अकादमी, काशी स्वर गंगा और रस सागर जैसे अनगिनत सम्मान उनकी झोली में थे। उनका जीवन दर्शन बेहद सरल था, वे अक्सर कहते थे कि “संगीत केवल प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है।”

उस्ताद अब्दुल राशिद खान ने केवल ग्वालियर घराने की परंपरा को ही नहीं सींचा, बल्कि वे भारत की साझा ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरे। उनके महाप्रयाण से शास्त्रीय संगीत के एक युग का अंत हुआ है, लेकिन उनकी बंदिशें और शिष्यों के कंठ में गूंजते उनके सुर उन्हें हमेशा जीवित रखेंगे। वे एक ऐसे विरले कलाकार थे, जिन्होंने एक सदी से भी अधिक समय तक संगीत को जिया और अंततः संगीत ने ही उन्हें कालजयी बना दिया।


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