धनतेरस: आरोग्य, समृद्धि और मृत्यु पर विजय का पर्व
हर वर्ष दिवाली के आगमन की आहट के साथ ही, दो दिन पूर्व, धनतेरस का पावन पर्व उल्लास और उमंग के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष 18 अक्टूबर को यह शुभ दिवस हमें धन और आरोग्य के देवों का आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर दे रहा है। धनतेरस का इतिहास सदियों पुराना है, जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन हम न केवल धन-धान्य की देवी महालक्ष्मी का पूजन करते हैं, बल्कि आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरि को भी नमन करते हैं। भगवान धन्वन्तरि, जिन्हें आयुर्वेद का प्रणेता और देवताओं का चिकित्सक माना जाता है, चिकित्सकों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से वे अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, जिसने देवताओं को अमरत्व प्रदान किया।
धनतेरस के प्रचलन के पीछे एक रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि देवताओं और असुरों के संयुक्त समुद्र मंथन के दौरान, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को, समुद्र से निकले नवरत्नों में एक थे ऋषि धन्वंतरि। जनकल्याण की भावना से वे अमृत कलश लेकर अवतरित हुए और देवताओं को पीकर अमर कर दिया। इसी कारण उन्हें ‘आरोग्य का देवता’ कहा जाता है, और आज भी लोग दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य की कामना से उनकी पूजा करते हैं।
इस पर्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू है मृत्यु के देवता यमराज की पूजा। उनके निमित्त एक दीपक जलाया जाता है, जिसे ‘यम दीपक’ कहते हैं। धार्मिक ग्रंथों में यमराज की पूजा से संबंधित एक मार्मिक कथा वर्णित है। एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या वे प्राणियों के प्राण हरते समय कभी दया का अनुभव करते हैं। यमदूतों ने नम्रतापूर्वक कहा कि वे तो केवल आज्ञा का पालन करते हैं, मोह-माया से उनका कोई वास्ता नहीं।
यमराज के बार-बार पूछने पर, यमदूतों ने एक घटना का वर्णन किया। एक राजा के पुत्र का जन्म हुआ, लेकिन ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के चार दिन बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। दुखी राजा की पत्नी ने नवजात शिशु को यमुना तट पर एक गुफा में भिजवा दिया, जहाँ उसकी शाही व्यवस्था के साथ परवरिश की गई। परन्तु, विधि का विधान अटल था। एक दिन उसी राज्य की राजकुमारी घूमते-घूमते उस गुफा के पास आ पहुंची। दोनों एक-दूसरे को देखकर मोहित हो गए और गंधर्व विवाह कर लिया। नियति के अनुसार, चार दिन बाद राजकुमार की मृत्यु हो गई। यमदूतों ने यमराज को बताया कि उन्होंने इतनी सुंदर जोड़ी कभी नहीं देखी थी, और राजकुमार के प्राण हरने के बाद नवविवाहिता राजकुमारी का करूण विलाप सुनकर उनका हृदय द्रवित हो उठा। यह वृतांत सुनकर यमराज ने कहा कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को धन्वंतरि ऋषि का पूजन और यमराज के लिए दीप दान करने से अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है। तभी से इस दिन धन्वंतरि ऋषि और यमराज की पूजा की प्रथा चली आ रही है।
धनतेरस पर नए बर्तन, विशेषकर तांबे, पीतल अथवा चांदी के बर्तन और आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। कुछ लोग इस दिन नई झाड़ू खरीदकर उसकी भी पूजा करते हैं, जिसे समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
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