काल भैरव अष्टमी: भय पर विजय और मनोकामना पूर्ति का पर्व
भगवान शिव के तीसरे रूद्र अवतार, काल भैरव, का प्रकट दिवस हर वर्ष मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पावन तिथि 22 नवंबर को पड़ रही है। पुराणों के अनुसार, इसी मध्याह्न काल में भगवान शिव से भैरव रूप की उत्पत्ति हुई थी, जो स्वयं काल (मृत्यु) से भी भयभीत करता है, इसीलिए उन्हें ‘कालभैरव’ कहा जाता है।
कालभैरव अष्टमी का महत्व:
ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास के अनुसार, भैरव अष्टमी को देवाधिदेव महादेव के रूद्र रूप काल भैरव की पूजा का विधान है। इस व्रत को रखने से भक्त की मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होती हैं। विधि-विधान से की गई पूजा से भगवान शिव के इस रौद्र रूप की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन प्रातः व्रत का संकल्प लेकर रात्रि में कालभैरव की विशेष पूजा की जाती है।
कालाष्टमी – भयनाशक पर्व:
काल भैरव अष्टमी को ‘कालाष्टमी’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसी दिन भगवान शिव के इस उग्र रूप का जन्म हुआ था। ‘भैरव’ का अर्थ है ‘भय को हरने वाला’। मान्यता है कि कालाष्टमी के दिन कालभैरव की पूजा करने से समस्त भय का नाश होता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और काल भैरव की पूजा का विधान है, जो विशेषतः रात्रि काल में की जाती है।
पौराणिक कथा और शक्ति का संगम:
शिवपुराण के अनुसार, अपने अहंकार में चूर अंधकासुर दैत्य ने जब भगवान शिव पर आक्रमण किया, तो उसके संहार के लिए स्वयं भगवान शिव के रक्त से काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव, शिव का ही एक स्वरूप हैं, जिनकी आराधना से समस्त दुखों और परेशानियों से मुक्ति मिलती है।
शुभ मुहूर्त और विशेष संयोग:
वैदिक पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 11 नवंबर की रात्रि 11:08 मिनट पर शुरू होकर 12 नवंबर की रात्रि 10:58 मिनट पर समाप्त होगी। चूँकि काल भैरव देव की पूजा निशा काल में होती है, इसलिए 12 नवंबर को कालाष्टमी मनाई जाएगी।
अष्टमी तिथि – शिव-शक्ति का मिलन:
अष्टमी तिथि, जिस पर काल भैरव प्रकट हुए थे, को ‘कालाष्टमी’ कहा जाता है। इस तिथि के स्वामी रूद्र हैं और कृष्णपक्ष की अष्टमी पर भगवान शिव की पूजा की परंपरा है। सालभर में आने वाले अष्टमी तिथि के सभी पर्व देवी से जुड़े होते हैं। इस तिथि पर शिव और शक्ति दोनों का प्रभाव होने से भैरव पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह तिथि भय को दूर करने वाले ‘भैरव’ से जुड़ी है, इसलिए इस दिन की पूजा नकारात्मकता, भय और अशांति को दूर करती है।
बीमारियों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ति:
‘भैरव’ का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। काल भैरव की पूजा से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर होता है। नारद पुराण के अनुसार, काल भैरव की पूजा से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से किसी रोग से पीड़ित है, तो उसे बीमारी और अन्य तकलीफों से भी मुक्ति मिलती है।
शुभ दान: ऊनी वस्त्र और दोरंगा कंबल:
इस बार काल भैरव अष्टमी शनिवार को पड़ रही है, जो एक विशेष संयोग है। इस अवसर पर दोरंगा कंबल दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे भैरव के साथ-साथ शनिदेव भी प्रसन्न होते हैं। इससे कुंडली में राहु-केतु के अशुभ फलों में भी कमी आती है। अगहन मास की शीत ऋतु को देखते हुए ऊनी कपड़ों का दान करना चाहिए, जिससे भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की कृपा भी प्राप्त होती है।
राहु, केतु और ग्रहों की शांति:
इस दिन कुत्तों को जलेबी और इमरती खिलाने की परंपरा है, जिससे काल भैरव प्रसन्न होते हैं। गाय को जौ और गुड़ खिलाने से राहु से संबंधित पीड़ाएं समाप्त होती हैं। सरसों का तेल, काले कपड़े, तली हुई चीजें, घी, जूते-चप्पल, कांसे के बर्तन और जरूरतमंदों को दान करने से शारीरिक और मानसिक परेशानियां दूर होती हैं। जाने-अनजाने हुए पाप भी क्षमा हो जाते हैं।
रात्रि पूजा का विशेष महत्व:
पुराणों के अनुसार, काल भैरव की उपासना प्रदोष काल (सूर्यास्त के पश्चात) या आधी रात में की जाती है। रात्रि जागरण कर भगवान शिव, माता पार्वती और कालभैरव की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन काल भैरव के वाहन, काले कुत्ते की भी पूजा की जाती है और उसे विभिन्न प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। पूजा के समय काल भैरव की कथा का श्रवण या पाठ करना भी फलदायी होता है।
कष्ट और भय का निवारण:
ग्रंथों के अनुसार, भगवान काल भैरव की पूजा करने वाले का हर डर दूर हो जाता है और उनके सभी कष्ट भैरव हर लेते हैं। यह भगवान शिव का एक अत्यंत प्रचंड रूप है। काल भैरव जयंती के दिन पूजा-अर्चना से मनचाही सिद्धियां प्राप्त होती हैं। काल भैरव को तंत्र का देवता भी माना जाता है।
कालभैरव जयंती का महत्व:
कालभैरव की पूजा से साधक को भय से मुक्ति मिलती है। यह ग्रह बाधा और शत्रु बाधा को भी दूर करती है। अच्छे कार्य करने वालों के लिए कालभैरव का स्वरूप कल्याणकारी है, जबकि अनैतिक कार्य करने वालों के लिए वे दंडनायक हैं। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति भैरव के भक्तों को अहित पहुंचाता है, उसे तीनों लोकों में कहीं भी शरण नहीं मिलती।
भीषण कष्टों से मुक्ति हेतु मंत्र जप:
भगवान कालभैरव, महादेव का ही अत्यंत रौद्र, भयाक्रांत, वीभत्स, विकराल और प्रचंड स्वरूप हैं। कालभैरव जयंती के दिन किसी भी शिव मंदिर में जाकर इन मंत्रों का जप करने से भीषण से भीषण कष्टों का नाश होता है और मरणासन्न व्यक्ति को भी जीवन दान मिल सकता है:
- ॐ कालभैरवाय नम:।
- ॐ भयहरणं च भैरव।
- ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्।
- ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं।
- ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।
पूजन विधि:
अष्टमी तिथि को प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाकर पूजन करें। कालभैरव भगवान की पूजा रात्रि में की जाती है। शाम को मंदिर जाकर भगवान भैरव की प्रतिमा के सामने चौमुखा दीपक जलाएं। फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल आदि अर्पित करें। आसन पर बैठकर कालभैरव चालीसा का पाठ करें, आरती करें और अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगे। प्रदोष काल या मध्यरात्रि में जरूरतमंदों को दोरंगा कंबल दान करें। ‘ऊं कालभैरवाय नम:’ मंत्र का 108 बार जाप करें। पूजा के बाद भगवान भैरव को जलेबी या इमरती का भोग लगाएं और कुत्तों को इमरती खिलाएं।
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