बिहार में साइबर अपराध के एक मामले ने ठगों के उस नेटवर्क का खुलासा किया है, जिसमें कथित तौर पर ग्रामीणों के भरोसे और उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल बैंक खातों और सिम कार्ड हासिल करने के लिए किया गया। मामला पटना जिले के बाढ़ इलाके की कोंदी पंचायत से जुड़ा है। पुलिस ने इस मामले में करीब 50 वर्षीय सीता देवी को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के मुताबिक, सीता देवी ग्रामीणों के संपर्क में आई और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का भरोसा दिया। इसी बहाने कई ग्रामीणों के बैंक खाते खुलवाए गए। जांच में सामने आया है कि बाद में इन खातों और उनसे जुड़े सिम कार्ड का इस्तेमाल साइबर अपराधियों ने कथित तौर पर ठगी की रकम को रखने और आगे ट्रांसफर करने के लिए किया।
500 ग्रामीणों के खातों में 15 करोड़ से ज्यादा की रकम
साइबर पुलिस की जांच के अनुसार, पिछले करीब तीन वर्षों में लगभग 500 ग्रामीणों के बैंक खातों में 15 करोड़ रुपये से अधिक की कथित साइबर ठगी की रकम पहुंचाई गई। पुलिस अब इन लेन-देन और खातों से जुड़े पूरे नेटवर्क की जांच कर रही है।
मामला तब सामने आया जब कुछ ग्रामीणों के बैंक खातों में मध्य प्रदेश और हैदराबाद से संदिग्ध रकम आने की जानकारी पुलिस तक पहुंची। जब पुलिस ने खाताधारकों से पूछताछ की तो उन्होंने रकम के बारे में जानकारी होने से इनकार किया।
इसके बाद बड़ी संख्या में ग्रामीण बैंक पहुंचे और अपने खाते बंद कराने की मांग करने लगे। कई खाताधारकों का कहना था कि उन्हें अपने खातों से होने वाले लेन-देन की जानकारी ही नहीं थी।
खाते खुलवाकर ATM, पासबुक और सिम अपने पास रखने का आरोप
पुलिस के मुताबिक, सीता देवी ने ग्रामीणों के लिए शिविर लगवाकर केनरा बैंक और सेंट्रल बैंक में खाते खुलवाए। ग्रामीणों को कथित तौर पर हर महीने 25 किलो अनाज मिलने का भरोसा भी दिया गया था।
आरोप है कि खाते खुलने के बाद ATM कार्ड, पासबुक और वेलकम किट जैसी चीजें सीता देवी अपने पास रख लेती थी। ग्रामीणों के आधार और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल उनके नाम पर सिम कार्ड लेने में भी किया गया।
इसके बाद इन्हीं सिम नंबरों के जरिए बैंक खातों का संचालन और कथित साइबर गतिविधियां की गईं। पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि ग्रामीणों के दस्तावेजों का इस्तेमाल उनकी जानकारी के बिना किस-किस तरीके से किया गया।
म्यूल अकाउंट क्या होता है?
साइबर अपराध की भाषा में म्यूल अकाउंट उस बैंक खाते को कहा जाता है जिसका इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति की संदिग्ध या अवैध रकम प्राप्त करने, निकालने या दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है।
ऐसे मामलों में वास्तविक खाताधारक कई बार यह दावा करता है कि उसे खाते में आने वाली रकम या उसके बाद हुए लेन-देन की जानकारी नहीं थी। साइबर अपराधी ऐसे खातों का इस्तेमाल ठगी की रकम को कई स्तरों पर ट्रांसफर करने के लिए कर सकते हैं, जिससे रकम के वास्तविक स्रोत तक पहुंचना जांच एजेंसियों के लिए मुश्किल हो जाता है।
पुलिस का कहना है कि इस मामले में भी ग्रामीणों के खातों का कथित तौर पर इसी तरह इस्तेमाल किया गया।
पंचायत स्तर के लोगों की भूमिका की भी जांच
इस कार्रवाई में पुलिस को कथित साइबर नेटवर्क में पंचायत स्तर के लोगों और अन्य स्थानीय संपर्कों की भूमिका के संकेत मिले हैं। पुलिस के मुताबिक, ग्रामीणों के बीच भरोसा रखने वाले लोग सरकारी योजनाओं का हवाला देकर उनके दस्तावेज जुटाने में मदद कर सकते थे।
जांच में प्रति म्यूल बैंक खाते के लिए कथित तौर पर 25 हजार से 35 हजार रुपये और प्रति सिम 3 हजार से 5 हजार रुपये तक कमीशन दिए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही हो सकेगी।
पुलिस ने गिरोह के कथित सरगना सरपंच संतोष मुखिया और उसके साथी आजाद की तलाश में नालंदा में भी छापेमारी की है। दोनों के फरार होने की बात पुलिस ने बताई है।
छापेमारी में मोबाइल, सिम और बायोमैट्रिक डिवाइस बरामद
साइबर डीएसपी संगीता कुमारी के मुताबिक, आरोपियों से जुड़े ठिकानों से 12 मोबाइल फोन, 13 सिम कार्ड, एक बायोमैट्रिक डिवाइस, दो पासबुक, दो ATM कार्ड और एक चेकबुक बरामद की गई है।
पुलिस ने आजाद का मोबाइल फोन भी जब्त किया है। दोनों आरोपियों के मोबाइल से जुड़े कॉल डिटेल रिकॉर्ड यानी CDR की जांच कराई जा रही है। पुलिस के अनुसार, आजाद के फोन में कई लोन कंपनियों के ऐप भी मिले हैं।
जांच एजेंसी अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन उपकरणों और खातों के जरिए किन लोगों से संपर्क किया गया और रकम किन-किन खातों में ट्रांसफर हुई।
बिहार में हजारों संदिग्ध म्यूल अकाउंट की पहचान
पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में बिहार में साइबर अपराध से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग के लिए 58,585 म्यूल अकाउंट चिन्हित किए गए हैं। इनमें पटना में 9,543, गया में 4,275 और नालंदा में 3,724 संदिग्ध खाते बताए गए हैं।
ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि साइबर ठगी के मामलों में बैंक खातों का इस्तेमाल केवल ऑनलाइन ठगी करने तक सीमित नहीं है। ठगी के बाद रकम को अलग-अलग खातों में पहुंचाना और आगे ट्रांसफर करना भी अपराधियों के नेटवर्क का अहम हिस्सा हो सकता है।
ग्रामीणों के लिए बड़ा सबक
इस मामले में ग्रामीणों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल बैंक खाता और दस्तावेजों की सुरक्षा का है। किसी भी सरकारी योजना, अनाज या आर्थिक लाभ के नाम पर किसी दूसरे व्यक्ति को ATM कार्ड, पासबुक, OTP, PIN या बैंकिंग जानकारी सौंपना जोखिम भरा हो सकता है।
यदि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में ऐसी रकम आती है जिसकी जानकारी उसे नहीं है, तो उसे तुरंत बैंक और पुलिस को इसकी सूचना देनी चाहिए। खाते में संदिग्ध लेन-देन को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते शिकायत करना जरूरी है।
पटना के बाढ़ इलाके में सामने आया यह मामला साइबर ठगी के लिए कथित म्यूल अकाउंट तैयार करने के तरीके पर रोशनी डालता है। पुलिस के अनुसार, ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं का भरोसा देकर उनके दस्तावेजों से बैंक खाते और सिम हासिल किए गए और बाद में उनका इस्तेमाल संदिग्ध रकम के लेन-देन में हुआ। 500 ग्रामीणों और 15 करोड़ रुपये से अधिक की रकम से जुड़े इस मामले में अभी जांच जारी है और फरार आरोपियों की तलाश की जा रही है।
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