संविधान की कसौटी पर अनोखी समस्या: क्या अनुच्छेद 370 का भूत सता रहा है?
यह मामला सचमुच “अनोखी समस्या” की श्रेणी में आता है, जैसा कि मेहता ने रेखांकित किया, और इसमें “व्यापक चिंताएं” अंतर्निहित हैं। एक “गंभीर वचनबद्धता” तो थी, लेकिन “कई कारकों पर विचार करने की आवश्यकता” है, जो इस पहेली को और जटिल बनाते हैं। सॉलिसिटर जनरल ने सीधे तौर पर “कुछ लोगों” पर “एक खास तरह का भ्रम फैलाने” और केंद्र शासित प्रदेश की “भयावह तस्वीर पेश करने” का आरोप लगाया, जिससे माहौल में एक नई परत जुड़ गई।
इस बीच, प्रधान न्यायाधीश गवई ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए कहा कि यह क्षेत्र “सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है,” और उन्होंने हाल ही में हुए “पहलगाम आतंकवादी हमले” का हवाला देकर अपनी बात को पुख्ता किया। दूसरी ओर, जहूर भट के पक्ष से पेश हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु उठाया। उनका तर्क था कि इस मामले को “पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के समक्ष रखा जाना चाहिए,” क्योंकि “अनुच्छेद 370 पर फैसला पांच सदस्यीय पीठ ने सुनाया था।” यह एक ऐसा सवाल है जो सीधे तौर पर हमारे संवैधानिक ढांचे और उसकी व्याख्या की नींव को छूता है।
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