जोहानिसबर्ग में जी-20: एक ऐतिहासिक मिलन, बदली विश्व व्यवस्था का संकेत
इस बार का जी-20 सम्मेलन मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि एक युगान्तरकारी घटना है। पहली बार, यह वैश्विक मंच अफ्रीकी धरती पर अपनी गर्जना कर रहा है, जो महज़ भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि वैचारिक क्रांति का ध्वजवाहक है। “ग्लोबल साउथ” के देशों द्वारा लगातार चौथी बार इसकी मेजबानी, यह स्पष्ट कर रही है कि विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था का गुरुत्वाकर्षण केंद्र, अब उत्तर से सरककर दक्षिण की ओर आ रहा है। दक्षिण अफ्रीका का जोहानिसबर्ग, एक मेजबान शहर से कहीं बढ़कर, उभरती हुई विश्व व्यवस्था का जीवंत मंच बन चुका है।
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इस महत्वपूर्ण सम्मेलन का बहिष्कार, वैश्विक संस्थाओं से दूरी और “अमेरिका फर्स्ट” की नीति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच, यह खबर भी सुर्खियां बटोर रही है कि अमेरिका अन्य सदस्य देशों पर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर न करने का दबाव बना रहा है। यदि ऐसा हुआ, तो यह न केवल जी-20 की सामूहिकता की भावना को गहरा आघात पहुंचाएगा, बल्कि अगले वर्ष जब अमेरिका स्वयं अध्यक्षता संभालेगा, तब उसकी अपनी साख भी सवालों के घेरे में होगी।
इसे भी पढ़ें: 350% टैरिफ, ट्रंप ने अब पीएम मोदी का नाम लेकर क्या नया दावा कर दिया?
यह सवाल अब यक्ष प्रश्न बन गया है कि जब अमेरिका इस मंच से अनुपस्थित होगा, तो दक्षिण अफ्रीका जी-20 की ‘बैटन’ किसे सौंपेगा? परंपरागत रूप से, यह जिम्मेदारी अध्यक्ष देश द्वारा अगले मेजबान को सौंपी जाती है, लेकिन ट्रंप की अनुपस्थिति इस प्रक्रिया को अभूतपूर्व बना देती है, जो दक्षिण अफ्रीका के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।
भारत का अनूठा अवसर: नेतृत्व की निरंतरता
इस पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस सम्मेलन में भाग लेना, अमेरिका की अनुपस्थिति को भारत के लिए एक अनूठे अवसर में बदल देता है। 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता ने न केवल संगठन की दिशा तय की, बल्कि “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” का आदर्श प्रस्तुत किया, जो आज विश्व की सामूहिक आवाज बन चुका है। अब, दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता के तहत, भारत इस ‘सततता’ को एक नई ऊंचाई पर ले जा सकता है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए स्पष्ट किया है कि वे सभी तीन सत्रों को संबोधित करेंगे— समावेशी और सतत आर्थिक वृद्धि, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और जलवायु परिवर्तन, तथा न्यायपूर्ण और संतुलित भविष्य। ये तीनों विषय, भारत की अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं के साथ पूरी तरह मेल खाते हैं।
नीतिगत संगति और ग्लोबल साउथ की आवाज
यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान ही आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्य समूह (Disaster Risk Reduction Working Group) की स्थापना की थी। अब दक्षिण अफ्रीका उसी एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है, जो भारत की पहल की अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति का प्रमाण है। इसी प्रकार, खाद्य सुरक्षा पर भारत द्वारा शुरू किया गया संवाद भी दक्षिण अफ्रीकी प्राथमिकताओं में शामिल है, जो दोनों देशों के दृष्टिकोण में एक गहरी नीतिगत संगति को दर्शाता है।
जोहानिसबर्ग का यह सम्मेलन, ग्लोबल साउथ के चार उभरते देशों— इंडोनेशिया, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की लगातार अध्यक्षताओं के क्रम का अंतिम चरण है। इन चारों देशों ने मिलकर विकासशील विश्व की चिंताओं जैसे- ऋण संकट, ऊर्जा संक्रमण और खाद्य असुरक्षा को केंद्र में रखा है। यह क्रम यह स्पष्ट करता है कि जी-20 अब केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं का क्लब नहीं रह गया है, बल्कि यह दक्षिणी गोलार्ध की आकांक्षाओं का एक शक्तिशाली मंच बनता जा रहा है।
“ग्लोबल साउथ” शब्द, भले ही भू-राजनीतिक हो, लेकिन इसका भावनात्मक सार कहीं अधिक व्यापक है। यह उन देशों की सामूहिक आकांक्षा है जो अब केवल ‘सहभागी’ नहीं, बल्कि ‘निर्णायक’ भूमिका में आना चाहते हैं। भारत इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहा है— नीतिगत दृष्टि से भी और कूटनीतिक सक्रियता से भी।
द्विपक्षीय कूटनीति और दक्षिण-दक्षिण सहयोग
प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय बैठकों पर भी दुनिया की गहरी नजर रहेगी। विशेष रूप से अफ्रीका के साथ भारत के बढ़ते सहयोग को देखते हुए, यह सम्मेलन भारत-अफ्रीका साझेदारी को और गहरा करने का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकता है। साथ ही, भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका (आईबीएसए) त्रिपक्षीय समूह की बैठक में मोदी की भागीदारी, दक्षिण-दक्षिण सहयोग को एक नई दिशा दे सकती है। भारत इस अवसर का उपयोग न केवल अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को मजबूत करने के लिए कर सकता है, बल्कि यह भी प्रदर्शित कर सकता है कि वैश्विक नेतृत्व केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि विश्व समुदाय को साथ लेकर चलने की क्षमता से भी आता है।
जोहानिसबर्ग: एक कसौटी, एक अवसर
बहरहाल, जोहानिसबर्ग का यह शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के लिए एक कूटनीतिक कसौटी है— उसे अमेरिकी अनुपस्थिति की चुनौती के बीच सम्मेलन को सफलतापूर्वक संपन्न करना है। वहीं, भारत के लिए यह एक अभूतपूर्व अवसर है, अपने नेतृत्व की निरंतरता को प्रदर्शित करने का। जब ट्रंप वैश्विक सहयोग से दूरी बना रहे हैं, तब मोदी उसी सहयोग को एक नई दिशा देने जा रहे हैं। यही विरोधाभास आज के वैश्विक परिदृश्य का सार है। इसलिए, जोहानिसबर्ग का सम्मेलन केवल जी-20 का आयोजन नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था के पुनर्संतुलन का प्रतीक है, और इस पुनर्संतुलन में भारत की भूमिका न केवल केंद्रीय है, बल्कि प्रेरक भी।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


