भारत विरोधी एजेंडा चलाने वाली ब्रिटिश सांसद को मिला कर्मों का फल: संसद से धक्के मारकर निकाली गईं जराह सुल्ताना
जिस ब्रिटिश सांसद ने हमेशा भारत के खिलाफ जहर उगला और कश्मीर के नाम पर अपना राजनीतिक धंधा चमकाया, आज उसे अपनी ही संसद में अपमान का घूंट पीना पड़ा। पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश सांसद जराह सुल्ताना, जो ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को क्लीन चिट देने और कश्मीर में मुस्लिमों पर कथित अत्याचार का झूठा नैरेटिव गढ़ने के लिए कुख्यात हैं, उन्हें सरेआम बेइज्जत कर ब्रिटिश पार्लियामेंट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
यह वही जराह सुल्ताना हैं जो दुनिया भर में घूम-घूम कर कश्मीर का रोना रोती हैं, जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि कश्मीर से हिंदुओं को लहूलुहान कर भगाया गया था। आज भी हिंदुओं को अमरनाथ यात्रा के लिए सेना की सुरक्षा की जरूरत पड़ती है, लेकिन जराह जैसे लोग सिर्फ अपना एजेंडा चलाने में व्यस्त रहते हैं। भारत में किसान आंदोलन के दौरान भी इन्होंने जमकर नफरत फैलाई थी। लेकिन कहते हैं न कि कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है।
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ब्रिटिश संसद में कार्रवाई के दौरान जराह सुल्ताना ने जोश में होश खोते हुए प्रधानमंत्री कीर स्टारमर को ‘झूठा’ कह दिया। कीर स्टारमर ने कोई वादा पूरा नहीं किया था, इसी बात पर वह उफर पड़ीं। लेकिन संसद के स्पीकर को यह बदतमीजी बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने जराह को बुरी तरह फटकारते हुए न केवल सदन से बाहर निकलवा दिया, बल्कि उन्हें तुरंत सस्पेंड भी कर दिया।
हैरानी की बात यह है कि ब्रिटेन जैसे देश में, जहां अब मुस्लिम एक बड़ा वोट बैंक बन चुके हैं और वहां की राजनीति उन्हें खुश रखने की कोशिश करती है, वहां भी प्रधानमंत्री का अपमान सहन नहीं किया गया। यह वही ब्रिटेन है जहां मुस्लिम वोटर्स के नाराज होने के डर से हजारों ब्रिटिश बच्चियों का यौन शोषण करने वाले पाकिस्तानियों को कड़ी सजा देने में भी हिचकिचाहट दिखाई जाती है। लेकिन जब बात खुद के प्रधानमंत्री की आई, तो इस मुस्लिम सांसद को उसकी हैसियत दिखा दी गई।
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अब इस पूरी घटना को भारत के नजरिए से देखिए। भारत में भी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति हावी रहती है, लेकिन यहां का माहौल बिल्कुल अलग है। भारत में चाहे कोई नेता हो, कट्टरपंथी हो या वामपंथी—वे सरेआम प्रधानमंत्री मोदी को कोसते हैं, उन्हें गालियां देते हैं और यहां तक कि उन्हें सत्ता से हटने के बाद देख लेने की धमकियां तक देते हैं। ब्रिटेन की इस घटना ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र और मर्यादा की सीमाएं क्या होनी चाहिए।
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