पाकिस्तान का दोहरा संकट: एक तरफ युद्ध का उन्माद, दूसरी तरफ शिक्षा का भयावह पतन
पाकिस्तान, एक ऐसा देश जो बाहरी मोर्चों पर जंग की बातें कर रहा है, वहीं अपने ही भीतर शिक्षा व्यवस्था के दम तोड़ने का गवाह बन रहा है. प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ से लेकर फील्ड मार्शल मुनीर तक, हर किसी की जुबां पर अफगानिस्तान से युद्ध की चिंता है. हाल ही में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने तो यहाँ तक कह दिया कि भारत और तालिबान मिलकर पाकिस्तान के खिलाफ जंग छेड़ रहे हैं और वह दोनों मोर्चों पर लड़ने को तैयार हैं. यह बयानबाजी ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक है. जून के अंत तक उसके पास महज 14.5 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा थी, जो पुराने कर्ज चुकाने, बढ़ाने और नए कर्ज लेने से आई है. वित्त वर्ष 2024-25 में पाकिस्तान ने 26.7 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज लिया, जिसमें से केवल 3.4 अरब डॉलर ही खास प्रोजेक्ट्स पर खर्च हुए.
लेकिन इन बाहरी चिंताओं और आर्थिक उहापोह के बीच, राजधानी इस्लामाबाद में शिक्षा का हाल बेहद दयनीय है. बच्चे स्कूल जाने के बजाय किसी युद्धक्षेत्र में जाने को मजबूर हैं. सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी है कि उनमें न तो पीने का पानी है, न शौचालय की सुविधा, और न ही पढ़ने लायक कक्षाएं. वहीं, निजी स्कूलों में फीस के नाम पर अभिभावकों से खुलेआम लूट मची हुई है. डॉन की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की स्थायी समिति ने इस्लामाबाद की शिक्षा व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की. समिति की अध्यक्ष, सांसद शाजिया सोबिया असलम सूमरो ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिक्षा अब देश में “अधिकार” नहीं, बल्कि “अमीरों का कारोबार” बन गई है.
सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव: एक भयावह सच्चाई
स्थायी समिति की बैठक में सांसदों ने चौंकाने वाले खुलासे किए. इस्लामाबाद के कई सरकारी स्कूलों में बच्चों को पीने के साफ पानी के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है. कई शौचालयों की हालत ऐसी है कि या तो वे बंद पड़े हैं या बिल्कुल जर्जर हो चुके हैं. कक्षाएं इतनी खराब हालत में हैं कि उनमें बैठना भी असुरक्षित लगता है. सरकार ने “एफडीई के तहत आईसीटी के शैक्षणिक संस्थानों में बुनियादी शिक्षा सुविधाओं का प्रावधान” जैसी परियोजनाएं शुरू की हैं, जिसके तहत 167 स्कूलों का नवीनीकरण किया जा रहा है. 71 स्कूल लगभग पूरे हो चुके हैं, 27 सौंपे जा चुके हैं और 400 नई कक्षाएं बन रही हैं. यह परियोजना साल के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है. लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह है कि जिन स्कूलों का सांसदों ने स्वयं निरीक्षण किया, वे इन योजनाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ थे, यानी वे अब भी उसी बदहाली में जी रहे हैं, भले ही उनके नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं चलाई जा रही हों.
निजी स्कूलों की मनमानी फीस: अभिभावकों का बढ़ता बोझ
बैठक का एक प्रमुख मुद्दा निजी स्कूलों द्वारा ली जाने वाली अत्यधिक फीस थी. सांसदों ने प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान नियामक प्राधिकरण (PEIRA) की भूमिका पर सवाल उठाए. नियमों के अनुसार, स्कूल हर साल फीस में अधिकतम 5% या उच्च प्रदर्शन वाले संस्थानों के लिए 8% तक की वृद्धि कर सकते हैं. हालांकि, हकीकत इससे बिल्कुल अलग है. कई निजी स्कूल इन नियमों को ताक पर रखकर मनमानी फीस बढ़ा रहे हैं, जिससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है. समिति ने PEIRA को अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह से असफल करार दिया और उसे एक पारदर्शी व निष्पक्ष फीस नीति तैयार करने का आदेश दिया. समिति का जोर इस बात पर था कि शिक्षा को कुछ अमीर घरानों का “विशेषाधिकार” न बनाकर, हर नागरिक का “सार्वजनिक अधिकार” बनाए रखना चाहिए.
स्कूलों में बढ़ता असुरक्षा का माहौल: बच्चों के लिए नया खतरा
रिपोर्ट में एक और गंभीर चिंता का विषय उठाया गया. सांसदों ने स्कूलों में बाल दुर्व्यवहार और नशीली दवाओं के बढ़ते मामलों पर गहरा दुख व्यक्त किया. सरकारी स्कूलों में बाल संरक्षण समितियां तो बनी हैं, लेकिन सांसदों के अनुसार, इन समितियों की कोई निगरानी नहीं है. न कोई फॉलो-अप है, न ही जवाबदेही. समिति ने ऐसे सभी मामलों की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पाकिस्तान के स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान बने रहें, न कि डर और खतरे का केंद्र. समिति ने चेतावनी दी है कि यदि जवाबदेही और पारदर्शिता नहीं लाई गई, तो पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था आने वाले समय में एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले सकती है.
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