भारत-यूरोप ट्रेड डील: अमेरिका को कड़ा संदेश और दुनिया में मची खलबली!
भारत और यूरोप के बीच हुई हालिया ट्रेड डील ने वैश्विक बाजार में एक नई हलचल पैदा कर दी है। इस समझौते से दुनिया के कई देश बेचैन हैं, खासकर पाकिस्तान, जिसे अब अपना बाजार डूबने का डर सता रहा है। लेकिन इस डील का सबसे दिलचस्प पहलू अमेरिका से जुड़ा है। सवाल उठ रहा है कि क्या ईयू (EU) के साथ हाथ मिलाकर भारत ने अमेरिका के सामने खुद को एक ‘अपर एडवांटेज’ की स्थिति में खड़ा कर लिया है?
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से ट्रेड वार्ता चल रही है, जो अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। इस बीच, जब केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल से अमेरिका के साथ संभावित डील पर सवाल हुआ, तो उनके तेवर देखने लायक थे। उन्होंने दोटूक शब्दों में साफ कर दिया कि भारत किसी दबाव में समझौता नहीं करेगा। गोयल का कहना है कि जब तक कोई सौदा पूरी तरह भारत के पक्ष में नहीं होगा और हमारे लोगों को उससे सीधा लाभ नहीं मिलेगा, तब तक बातचीत का सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका के साथ यह बातचीत किसी ‘डेडलाइन’ के दबाव में नहीं हो रही है।
पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि हर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) अपनी खूबियों और शर्तों पर आधारित होता है। भारत अपनी जरूरतों और नफा-नुकसान को तौलकर ही फैसला लेता है। कोई भी डील किसी दूसरी डील पर निर्भर नहीं होती। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए नए वैश्विक बाजार खोलेगा। सरकार की प्राथमिकता हमारे निर्यातकों को नए अवसर देने के साथ-साथ किसानों, मछुआरों, पशुपालकों और लघु उद्योगों को पूर्ण संरक्षण देना है।
भारत के इस रुख ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी आर्थिक नीतियों के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है। यूरोप और गल्फ देशों के साथ बढ़ते कदम इस बात का प्रमाण हैं कि भारत दुनिया भर में नए विकल्पों को सफलतापूर्वक तलाश रहा है। वाशिंगटन के लिए इसमें एक छिपा हुआ संदेश भी है—अंतरराष्ट्रीय व्यापार अब किसी की ‘दादागिरी’ से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और दोनों देशों के बराबर लाभ से तय होगा।
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