वैश्विक राजनीति की बिसात पर इस वक्त एक ऐसा विरोधाभास उभर रहा है जो जितना दिलचस्प है, उतना ही खतरनाक भी। एक तरफ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन खुद को शांतिदूत के रूप में पेश करते हुए ईरान संकट के समाधान की कमान थामना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें कड़ा आईना दिखाया है। ट्रंप का रुख साफ है—अगर शांति की इतनी ही फिक्र है, तो पहले यूक्रेन युद्ध का अंत करो। यह टकराव सिर्फ दो नेताओं का नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकताओं का है।
रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुई हालिया उच्चस्तरीय बैठक ने मास्को के इरादों को स्पष्ट कर दिया है। पुतिन और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच हुई चर्चा इस बात की गवाह है कि रूस इस पूरे संकट में एक निर्णायक खिलाड़ी बनना चाहता है। अराघची ने खुले तौर पर पुतिन के समर्थन का आभार जताया, जबकि पुतिन ने क्षेत्रीय शांति के लिए हर मुमकिन कोशिश का वादा किया। मास्को का यह संदेश पश्चिम के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है कि वह ईरान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है, ठीक उसी तरह जैसे चीन और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां खड़ी हैं।
इस कूटनीतिक ड्रामे में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब ट्रंप और पुतिन के बीच फोन पर सीधी बातचीत हुई। पुतिन ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम में मध्यस्थता की पेशकश करते हुए एक बड़ा दांव चला—उन्होंने प्रस्ताव दिया कि रूस, ईरान के करीब नौ सौ सत्तर पाउंड समृद्ध यूरेनियम भंडार की जिम्मेदारी संभाल सकता है। यह एक ऐसा प्रस्ताव है जो वैश्विक शक्ति संतुलन को रातों-रात बदल सकता है। हालांकि, ट्रंप ने इस पर बेहद तीखा और ठंडा जवाब दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें तब ज्यादा खुशी होगी जब पुतिन अपनी ऊर्जा यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने में लगाएं। ट्रंप का यह बयान महज एक सुझाव नहीं, बल्कि एक सख्त चेतावनी है कि अमेरिका रूस को उसकी सीमाओं के भीतर ही देखना चाहता है।
ट्रंप का यूक्रेन और ईरान, दोनों ही मुद्दों पर रुख बेहद आक्रामक रहा है। उन्होंने दो टूक कहा कि ईरान को झुकना ही होगा और हार माननी होगी। अमेरिका ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अपनी आर्थिक नाकेबंदी को और सख्त कर दिया है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ गई है। ट्रंप इसे किसी भी बमबारी से ज्यादा मारक हथियार मानते हैं। उनका दावा है कि इस दबाव के चलते तेहरान की हालत बेहद नाजुक हो चुकी है।
वहीं, ईरान भी अपनी चालें संभलकर चल रहा है। उसने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने का प्रस्ताव तो दिया, लेकिन बदले में अमेरिका और इजराइल से लिखित गारंटी मांगी कि भविष्य में उस पर कोई हमला नहीं होगा। ट्रंप ने इस शर्त को सिरे से खारिज कर दिया है, जिससे कूटनीतिक बातचीत के रास्ते और भी संकरे हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि अमेरिका एक सोची-समझी दोहरी रणनीति पर चल रहा है—दिखावे के लिए बातचीत और पर्दे के पीछे लगातार बढ़ता आर्थिक व सैन्य दबाव। ईरान के ईंधन निर्यात पर लगी पाबंदियां इसी रणनीति का मुख्य हिस्सा हैं।
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल ग्रोसी के साथ रूस की बातचीत ने इस मामले को और पेचीदा बना दिया है। पर्दे के पीछे ईरान के समृद्ध यूरेनियम को हटाने को लेकर बड़ी सौदेबाजी चल रही है। रूस ने यह चेतावनी भी दी है कि ईरान की धरती पर किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई के विनाशकारी परिणाम होंगे। यह सीधी तौर पर अमेरिका को रोकने की कोशिश है। अब सवाल यह उठता है कि क्या पुतिन वाकई शांति के मसीहा बन रहे हैं या यह उनके शक्ति विस्तार की एक नई चाल है? और क्या ट्रंप की अडिग प्राथमिकताएं दुनिया को किसी बड़े महायुद्ध की ओर ले जा रही हैं?
आज दुनिया एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक तरफ बातचीत और संतुलन का वह रास्ता है जिसे पुतिन दिखाने का प्रयास कर रहे हैं, और दूसरी तरफ ट्रंप की सख्त शर्तें हैं जो उस रास्ते को और अधिक दुर्गम बना रही हैं। फैसला भविष्य के गर्भ में है कि जीत कूटनीति की होगी या टकराव की।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


