भारतीय अर्थव्यवस्था का भविष्य: विकास और महंगाई के बीच संतुलन साधता रिजर्व बैंक
नई दिल्ली: वैश्विक अनिश्चितताओं, भारतीय अर्थव्यवस्था पर उनके संभावित प्रभावों और रुपये की गिरती कीमत के बीच, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने एक बार फिर अपनी नीतिगत ब्याज दरों को 5.5% पर अपरिवर्तित रखा है। यह निर्णय, 2025 की शुरुआत से अब तक 100 आधार अंकों की कटौती के बाद लिया गया है, जिसका उद्देश्य विकास और मुद्रास्फीति के बीच नाजुक संतुलन बनाए रखना है।
बैंकिंग क्षेत्र की गतिशीलता: ऋण और जमा का खेल
आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, जून तिमाही में बैंकिंग ऋण में 9.5% की वृद्धि देखी गई, जबकि जमा राशि में 10.1% की वृद्धि हुई। यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीष्मकालीन बुवाई और मॉनसून के दौरान निवेश और खपत में आई नरमी का परिणाम है। कमजोर मांग के कारण, मार्च 2025 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष में बैंकिंग क्षेत्र की ऋण वृद्धि पिछले वर्ष के 16% से घटकर 12% रहने का अनुमान है।
इस बीच, जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) की मौजूदा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद है। आगामी वित्त वर्ष से, केंद्रीय बैंक जोखिम-आधारित प्रीमियम मॉडल पेश करेगा, जिसमें मजबूत बैंक कम प्रीमियम देंगे और कमजोर बैंक अधिक। इससे मजबूत बैंकों की लागत कम होगी और वे ऋण देने के लिए अधिक पूंजी का उपयोग कर सकेंगे, जबकि कमजोर बैंक स्वयं को मजबूत करने के लिए प्रेरित होंगे। यह कदम न केवल आम जनता के पैसे को अधिक सुरक्षित बनाएगा, बल्कि बैंकिंग प्रणाली को और मजबूत करेगा।
रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण: नई राहें, नए अवसर
टैरिफ और रुपये में गिरावट के बावजूद, भारत की बाहरी व्यापारिक पारिस्थितिकी लचीली बनी हुई है। इसे और मजबूत करने के लिए, केंद्रीय बैंक ने नेपाल, भूटान और श्रीलंका में अनिवासियों को रुपये में सीमा पार ऋण देने की अनुमति देने का प्रस्ताव रखा है। इससे न केवल रुपया मजबूत होगा, बल्कि भारतीय कारोबारियों को आयात-निर्यात में भी आसानी होगी।
2022 में “स्पेशल रुपी वोस्ट्रो खाते” की शुरुआत के बाद, भारत रूस के साथ रुपये में व्यापार कर चुका है और जल्द ही ईरान के साथ भी यह शुरुआत करेगा। आरबीआई की योजना 18 देशों के साथ रुपये में व्यापार शुरू करने की है, जिससे विदेशी मुद्रा की मांग और विनिमय जोखिम में कमी आएगी, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुपये की स्वीकार्यता बढ़ेगी।
मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: विकास की ओर बढ़ते कदम
जीएसटी दरों में कटौती और खाद्य पदार्थों की कीमतों में नरमी के कारण, आगामी महीनों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति के कम रहने की उम्मीद है। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने मुद्रास्फीति अनुमानों को 3.1% से घटाकर 2.6% कर दिया है। दूसरी और तीसरी तिमाही के लिए भी अनुमानों में कमी की गई है।
खुदरा महंगाई के कम रहने से विकास को बल मिलेगा और आगामी मौद्रिक समीक्षाओं में आरबीआई को नीतिगत दरों में कटौती करने में आसानी होगी। इससे बैंकों की उधारी दरों में कमी आएगी, मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी।
विकास की गति: आशावादी दृष्टिकोण
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) ने मजबूत घरेलू मांग और जीएसटी सुधारों के कारण भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान को 2025 में 6.7% कर दिया है। हालांकि, एशियाई विकास बैंक ने पहली तिमाही में जीडीपी की मजबूत वृद्धि के बावजूद, टैरिफ की वजह से वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भारत के विकास पूर्वानुमान को घटाकर 6.5% कर दिया है।
एकाध अपवाद को छोड़ दें, तो अधिकांश अर्थशास्त्री मानते हैं कि जीएसटी सुधार, मौद्रिक सहजता, घरेलू मांग में मजबूती और आर्थिक गतिविधियों में तेजी जीडीपी वृद्धि दर को बल देगी। हालांकि, हाल में औद्योगिक उत्पादन वृद्धि में आई नरमी चिंता का विषय है, जो मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र में सुस्ती के कारण है। बावजूद इसके, त्योहारी मांग और जीएसटी सुधार से जल्द ही वृद्धि दर में तेजी आने की उम्मीद है।
निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, भारतीय रिजर्व बैंक ने अमेरिकी टैरिफ, रुपये की कमजोरी तथा विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए रेपो दर को यथावत रखा है। यह एक संतुलित दृष्टिकोण है जो भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करेगा और भविष्य में विकास की राह को प्रशस्त करेगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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