मुंबई की सबसे बड़ी राजनीतिक पंचायत का घड़ी तेज हो गई है। सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है, जहां यह सवाल बड़ा है कि मुंबई की मेयर की चाबी आखिर किसके हाथ में होगी? भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हो या शिंदे सेना—अटकलों का बाजार गर्म है, और शहरी विकास विभाग ने अंततः निर्णायक ‘लॉटरी’ की तारीख की पुष्टि कर दी है।
दिलचस्प बात यह है कि चर्चाओं का बाजार उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और भाजपा के बीच होने वाले संभावित गठजोड़ को लेकर भी गर्म है। इन सबके बीच, राज्य के 29 महानगरों में महापौर पद के आरक्षण की किस्मत 22 जनवरी (गुरुवार) को तय होगी। यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया सुबह 11 बजे मंत्रालय के परिषद कक्ष में होगी, और इसी के बाद उम्मीदवारों की राह आसान होगी।
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राजनीतिक समीकरण उस वक्त और उलझ गए जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस रवाना हो गए। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए रविवार को दावोस रवाना हुए फडणवीस के 24 जनवरी को लौटने की उम्मीद है। यह यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद ही महापौर पद पर राजनीतिक स्पष्टता आने की संभावना है। कानूनी प्रक्रिया की बात करें तो अब तक महापौर पद के लिए एससी, एसटी, महिला और ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण बारी-बारी से तय किया जाता था, लेकिन सूत्रों की मानें तो अब नियमों में बदलाव कर इसे चक्रीय रूप दिया जा सकता है।
सत्ता की बिसात बिछाने की कोशिशें अब भी जारी हैं। दलबदल की आशंकाओं के चलते शिंदे गुट ने अपने पार्षदों को बांद्रा के एक पांच सितारा होटल में डेरा डाल दिया है। हालांकि पार्टी इसे नए पार्षदों के लिए संवाद और मार्गदर्शन कार्यक्रम बता रही है, लेकिन हलकों में इसे आंतरिक एकता बनाए रखने और सौदेबाजी से बचने की रणनीति माना जा रहा है। शिंदे ने यह भी स्पष्ट किया कि यह ठहराव विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण है जब उनके 29 सदस्यीय समूह का कोंकण संभागीय आयुक्त के पास औपचारिक पंजीकरण हो रहा है।
बीएमसी में वर्र्चस्व की लड़ाई अब सार्वजनिक बयानबाजी के रूप में तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने शिंदे खेमे पर बड़ा दावा करते हुए कहा कि उनके ही कई पार्षद मुंबई में भाजपा मेयर नहीं चाहते। उन्होंने उपमुख्यमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि मेयर शिवसेना से ही होगा, और यह भी याद दिलाया कि इतिहास में शिवसेना ने मुंबई को 23 मेयर दिए हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए फडणवीस ने व्यंग्य कसते हुए कहा कि "ईश्वर की इच्छा" के कई अर्थ हो सकते हैं। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह नहीं समझ पा रहे हैं कि राउत ऊपर वाले भगवान की बात कर रहे हैं या उनकी, क्योंकि लोग उन्हें "देवभाऊ" भी कहते हैं।
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