धनतेरस: ऐश्वर्य, आरोग्य और समृद्धि का मंगल पर्व
कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी, धन की देवी के उत्सव का आरंभ है – यही है धनतेरस का पावन दिन। धन त्रयोदशी और धन्वन्तरी त्रयोदशी के नाम से भी विख्यात यह पर्व, पाँच दिवसीय दीपोत्सव का पहला अध्याय है। इस दिन गणेश जी, माँ लक्ष्मी, ब्रह्मा, विष्णु और महेश – पंच देवताओं की उपासना की जाती है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश के साथ स्वयं धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी और आरोग्य के देवता भगवान धन्वन्तरी का अवतरण हुआ था। इसी अलौकिक घटना की स्मृति में, ऐश्वर्य और सौभाग्य की वृद्धि हेतु बर्तनों की खरीदारी की परंपरा का जन्म हुआ।
ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, इस वर्ष धनतेरस का पर्व 18 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। यह औषधियों के जनक, भगवान धन्वन्तरी की जयंती भी है। भारतीय पंचांग के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि, धन के उत्सव का सूत्रपात करती है। धनतेरस, दिवाली से ठीक दो दिन पूर्व मनाया जाता है। यह विश्वास है कि इस दिन खरीदे गए किसी भी नए सामान से धन में तेरह गुना वृद्धि होती है।
धन त्रयोदशी, धन्वंतरि जयंती और दिवाली के इस महा पर्व का आरंभ
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास बताते हैं कि धनतेरस, जिसे धन त्रयोदशी और धन्वंतरि जयंती के रूप में भी जाना जाता है, पाँच दिवसीय दीपावली उत्सव का प्रथम दिवस है। यह तिथि आयुर्वेद के प्रवर्तक, भगवान धन्वन्तरी के समुद्र मंथन से अमृत कलश के साथ प्रकट होने की गवाह है। इसी कारण, हर वर्ष धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि इस शुभ दिन पर सोने-चांदी, बर्तन, जमीन-जायदाद जैसी कीमती चीजों की खरीदारी करने से तेरह गुना लाभ प्राप्त होता है। चिकित्सकों के लिए यह दिन विशेष है, क्योंकि वे अमृतधारी भगवान धन्वन्तरि की पूजा करेंगे। इसी दिन से यमराज के लिए दीपदान की शुरुआत होती है, जो पांच दिनों तक चलता है। धनतेरस के दिन खरीदा गया सोने या चांदी का धातुमय पात्र अक्षय सुख प्रदान करता है। लोग इस दिन नए बर्तन और अन्य नवीन वस्तुएं खरीदकर अपने घर को सजाते हैं।
त्रयोदशी तिथि का शुभ मुहूर्त:
- प्रारंभ: 18 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12:18 बजे से
- समाप्त: 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर 1:51 बजे तक
रोग, शोक से मुक्ति का ‘यमदीप’
ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि धनतेरस पर ‘यमदीप’ प्रज्वलित करने की भी एक महत्वपूर्ण परंपरा है। रोग, शोक, भय, दुर्घटना और अकाल मृत्यु से बचाव के लिए धनतेरस की शाम घर के बाहर यमदीप जलाया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन धनवंतरी ने सौ तरह की व्याधियों के ज्ञान के साथ-साथ अकाल मृत्यु से बचाव के लिए यमदीप जलाने का महत्व बताया था।
धनत्रयोदशी की सायंकाल, यमराज को प्रसन्न करने के लिए दीपदान किया जाता है, जिसे ‘यम दीपदान’ कहते हैं। घर के मुख्य द्वार पर गोबर का लेपन करके, मिट्टी के दो दीयों में तेल डालकर उन्हें प्रज्वलित किया जाता है। दीये जलाते समय ‘दीपज्योति नमोस्तुते’ मंत्र का जाप करें और अपना मुख दक्षिण दिशा की ओर रखें। धनत्रयोदशी पर ‘यम दीपदान’ करने से घर-परिवार के सदस्यों पर अकाल मृत्यु का खतरा नहीं रहता। इसी दिन, लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाई जाती है और महालक्ष्मी के छोटे-छोटे पद चिन्ह लगाए जाते हैं। धनतेरस पर माता लक्ष्मी के अतिरिक्त धन्वंतरी और कुबेर की भी पूजा की जाती है। प्राचीन काल में, लोग इस दिन नए बर्तन खरीदकर उनमें खीर-पकवान बनाकर धनवंतरी भगवान को भोग लगाते थे।
धनतेरस की पूजा में शामिल करें ये सामग्री:
लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने के लिए धनतेरस की पूजा में कुछ विशेष सामग्री का उपयोग किया जाता है:
- पान: शास्त्रों में धनतेरस की पूजा सामग्री में पान का विशेष महत्व है। पान के पत्तों में देवी-देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए इसका प्रयोग शुभ फलदायी होता है।
- सुपारी: धनतेरस की पूजा सुपारी के बिना अधूरी मानी जाती है। सुपारी को ब्रह्मदेव, यमदेव, वरुण देव और इंद्रदेव का प्रतीक माना जाता है। पूजा में प्रयुक्त सुपारी को तिजोरी में रखना अत्यंत लाभदायक होता है।
- साबुत धनिया: कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, धनतेरस के दिन साबुत धनिया खरीदकर मां लक्ष्मी के समक्ष अर्पित करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
- बताशा और खील: बताशा मां लक्ष्मी का अत्यंत प्रिय भोग है। पूजा में बताशे का प्रयोग करने से हर समस्या का समाधान होता है। खील भी इस दिन अत्यंत शुभ मानी जाती है, जो धन समृद्धि को बनाए रखती है।
- दीया: पूजा से पूर्व मां लक्ष्मी के समक्ष दीपक जलाना न भूलें, इससे यमदेव भी प्रसन्न होते हैं।
- कपूर: मां लक्ष्मी, कुबेर और भगवान धनवंतरी की पूजा में कपूर अवश्य जलाएं। कपूर जलाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
धनतेरस पर लक्ष्मी जी की पूजा का रहस्य:
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु जब मृत्युलोक विचरण करने आए, तो देवी लक्ष्मी ने भी उनके साथ चलने का आग्रह किया। विष्णु जी ने कहा, ‘यदि तुम मेरे कहे अनुसार चलोगी, तभी हम साथ चलेंगे।’ लक्ष्मी जी सहमत हो गईं और वे भूमंडल पर आ गईं। एक स्थान पर पहुंचकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी से कहा, ‘जब तक मैं न आऊं, यहीं ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना।’ विष्णु जी के जाने पर लक्ष्मी जी को कौतूहल हुआ कि दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है, जो उन्हें जाने से मना किया गया था।
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास बताते हैं कि लक्ष्मी जी से रहा न गया और वे पीछे-पीछे चल पड़ीं। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें सरसों का खेत दिखाई दिया, जिसकी शोभा देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गईं। उन्होंने फूल तोड़कर अपना श्रृंगार किया और आगे बढ़ीं। आगे एक गन्ने के खेत से उन्होंने गन्ने तोड़कर उनका रस चूसना शुरू कर दिया। उसी समय भगवान विष्णु आए और यह देखकर उन्होंने लक्ष्मी जी को शाप देते हुए कहा, ‘मैंने तुम्हें इधर आने से मना किया था, पर तुम न मानीं और किसान के खेत में चोरी का अपराध कर बैठीं। अब इस अपराध के जुर्म में तुम इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो।’ ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मी जी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं।
एक दिन लक्ष्मी जी ने किसान की पत्नी से कहा, ‘स्नान करके पहले मेरी बनाई हुई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना। तब तुम जो मांगोगी, वह मिलेगा।’ किसान की पत्नी ने वैसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से परिपूर्ण हो गया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष बाद जब लक्ष्मी जी जाने के लिए तैयार हुईं, तो विष्णु जी उन्हें लेने आए। किसान ने उन्हें भेजने से इनकार कर दिया। तब भगवान ने कहा, ‘इन्हें कौन जाने देता है? ये तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इन्हें बड़े-बड़े भी न रोक सके। मेरा शाप था, इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष की सेवा का समय पूरा हो चुका है।’ किसान हठपूर्वक बोला, ‘नहीं! अब मैं लक्ष्मी जी को नहीं जाने दूंगा।’
तब लक्ष्मी जी ने कहा, ‘हे किसान! यदि तुम मुझे रोकना चाहते हो, तो जो मैं कहूं वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना। एक तांबे के कलश में रुपये भरकर मेरे लिए रखना। मैं उस कलश में निवास करूंगी, किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी।’ लक्ष्मी जी ने आगे कहा, ‘इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी।’ यह कहकर वे दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मी जी के कथानुसार पूजन किया, और उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया। तभी से हर साल तेरस के दिन लक्ष्मी जी की पूजा होने लगी।
धनतेरस पर यमराज की पूजा का विधान:
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, पौराणिक कथाओं में हेम नामक एक राजा थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। काफी समय बाद उन्हें एक पुत्र प्राप्त हुआ। जब बालक की कुंडली बनाई गई, तो ज्योतिषियों ने कहा कि उसकी शादी के दसवें दिन मृत्यु का योग है। यह सुनकर राजा हेम ने पुत्र की शादी कभी न करने का निश्चय किया और उसे एक ऐसे स्थान पर भेज दिया जहाँ कोई स्त्री न हो। परंतु, नियति को कौन टाल सकता है? घने जंगल में राजा के बेटे को एक सुंदर स्त्री मिली और दोनों को आपस में प्रेम हो गया। फिर दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया।
भविष्यवाणी के अनुसार, विवाह के दसवें दिन यमदूत राजा के प्राण लेने पृथ्वीलोक आए। जब वे प्राण ले जा रहे थे, तो उसकी पत्नी के रोने की आवाज सुनकर यमदूत का मन दुखी हो गया। यमदूत जब प्राण लेकर यमराज के पास पहुंचे, तो वे बहुत दुखी थे। यमराज ने कहा कि दुखी होना स्वाभाविक है, परंतु कर्तव्य के आगे कुछ नहीं। ऐसे में यमदूत ने यमराज से पूछा, ‘क्या इस अकाल मृत्यु को रोकने का कोई उपाय है?’ तब यमराज ने कहा, ‘यदि मनुष्य कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन संध्याकाल में अपने घर के द्वार पर दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा, तो उसके जीवन से अकाल मृत्यु का योग टल जाएगा।’ तब से धनतेरस के दिन यम पूजा का विधान है।
धनतेरस का महत्व:
- इस दिन नए उपहार, सिक्के, बर्तन व गहनों की खरीदारी करना अत्यंत शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त में पूजा के साथ सात धान्यों (गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर) की पूजा की जाती है।
- धनतेरस के दिन चांदी खरीदना शुभ माना जाता है।
- भगवान धन्वन्तरी की पूजा से स्वास्थ्य और सेहत प्राप्त होता है। इसी दिन दिवाली की रात लक्ष्मी-गणेश की पूजा हेतु मूर्तियाँ भी खरीदी जाती हैं।
धनतेरस के दिन क्या करें:
- इस दिन धन्वंतरि का पूजन करें।
- नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें।
- सायंकाल दीपक प्रज्वलित कर घर, दुकान आदि को सुसज्जित करें।
- मंदिर, गोशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाबों, बगीचों में भी दीपक जलाएं।
- यथाशक्ति तांबे, पीतल, चांदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन और जेवर खरीदें।
- हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर, उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरें।
- कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआँ, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएं।
धनतेरस पर खरीदें ये शुभ वस्तुएं:
भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास बताते हैं कि दिवाली से पूर्व धनतेरस पर पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन धन और आरोग्य के लिए भगवान धन्वन्तरी और कुबेर की पूजा की जाती है। इस वर्ष धनतेरस 13 नवंबर को मनाया जाएगा। धनतेरस के दिन कुछ खास सामान खरीदना भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इन शुभ वस्तुओं को खरीदने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और धन लाभ भी होता है।
- सोना-चांदी: धनतेरस पर धातु की खरीद को विशेष महत्व दिया जाता है। मान्यता है कि इस दिन धातु खरीदने से भाग्य अच्छा बनता है। परंपरा है कि धनतेरस पर सोना, चांदी अवश्य खरीदना चाहिए। बजट के अनुसार सोना, चांदी के सिक्के, गहने, मूर्तियाँ आदि खरीदी जा सकती हैं।
- कुबेर यंत्र: धनतेरस पर कुबेर यंत्र खरीदना भी शुभ माना जाता है। इसे घर, दुकान के गल्ले या तिजोरी में स्थापित करना चाहिए। इसके बाद ‘ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन-धान्यधिपतये धन-धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा’ मंत्र का 108 बार जप करने से धन की कमी का संकट दूर होता है।
- श्री कुबेर मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं दरिद्र विनाशनि धनधान्य समृद्धि देहि, देहि कुबरे शंख विद्ये नमः ।।
- तांबा: धनतेरस के दिन तांबे की वस्तुएं या बर्तन लाने का विशेष महत्व है। यह स्वास्थ्य के लिए भी शुभ माना जाता है। साथ ही, कांसे से बनी सजावटी वस्तुएं या बर्तन भी घर लाए जा सकते हैं।
- झाडू: धनतेरस के दिन झाडू खरीदना भी शुभ होता है। मान्यता है कि इस दिन झाडू खरीदने से गरीबी दूर होती है। नई झाडू नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और घर में लक्ष्मी का वास होता है।
- शंख-रुद्राक्ष: भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास बताते हैं कि धनतेरस के दिन शंख खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन शंख खरीदकर उसकी पूजा करें। शास्त्रों के अनुसार, जिस घर में नित्य पूजा के समय शंख बजाया जाता है, उस घर से मां लक्ष्मी कभी नहीं जातीं, और घर के संकट भी दूर हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, सात मुखी रुद्राक्ष धनतेरस के दिन घर लाने से सभी कष्ट दूर होते हैं।
- भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्ति: भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्लेषक डॉ. अनीष व्यास के अनुसार, धनतेरस के दिन भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी की मूर्ति घर लाना चाहिए। मान्यता है कि इससे घर में पूरे वर्ष धन और अन्न की कमी नहीं होती है। ये दोनों देवी-देवता धन और बुद्धि बढ़ाते हैं।
- नमक-धनिया: धनतेरस के दिन नमक अवश्य खरीदें। ऐसा माना जाता है कि इस दिन नमक घर में लाने से धन की बढ़ोतरी होती है और दरिद्रता का नाश होता है। इसके अलावा, धनिया भी इस दिन घर में लाना चाहिए। साबुत धनिया लाने का विशेष महत्व है। इसे पूजा के बाद घर के आंगन और गमलों में डाल देना चाहिए।
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